ईरान युद्ध के बीच यूएसएस लिंकन पर अमेरिकी सैनिकों का बुरा हाल, 200 से अधिक दिनों से समंदर में फंसे 5,000 जवान, परिवारों ने नेवी अफसरों को घेरा विश्व एक घंटा पहले 4
ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस लिंकन पर तैनात 5,000 जवानों के हालात बदतर हो गए हैं। लगभग 259 दिनों की तैनाती और लगातार समंदर में रहने से परेशान सैनिकों के परिवारों ने सैन डिएगो में अमेरिकी नौसेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

चीन के प्रसिद्ध सैन्य रणनीतिकार सुन जू ने सदियों पहले अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'आर्ट ऑफ वॉर' में लिखा था कि किसी भी देश के लिए अपनी सेना को लंबे समय तक किसी युद्ध क्षेत्र में तैनात रखना बेहद नुकसानदेह साबित होता है। इससे न केवल सरकार के मूल्यवान संसाधन तेजी से नष्ट होते हैं, बल्कि मोर्चे पर डटे सैनिकों का हौसला और जोश भी पूरी तरह ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सैन्य सलाहकारों और जनरलों ने इतिहास के इस महत्वपूर्ण सबक को नजरअंदाज कर दिया है।

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे इस लंबे गतिरोध को अब लगभग छह महीने का समय बीतने वाला है। हालांकि वर्तमान में दोनों देशों के बीच कोई सीधा या भीषण सैन्य संघर्ष नहीं हो रहा है, लेकिन किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच पाने की वजह से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सेना को लगातार युद्ध क्षेत्र में बने रहना पड़ रहा है। यही वजह है कि अमेरिकी रक्षा बलों के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अमेरिकी नौसेना के सबसे बड़े और शक्तिशाली विमानवाहक पोतों में शुमार यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों की बदतर होती स्थिति को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि में सैनिकों की जरूरत से ज्यादा लंबी तैनाती, खराब जीवन स्थितियों और असहनीय मानसिक दबाव ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। यही कारण है कि अब सैनिकों के परिवार खुद आगे आकर नौसेना के आला अधिकारियों से सीधे जवाब मांग रहे हैं।

259 दिनों की तैनाती और महीनों तक जमीन का दीदार नहीं

इस पूरे विवाद की जड़ में सैनिकों की अत्यधिक लंबी और थकाऊ ड्यूटी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विशालकाय विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस लिंकन बीते साल 21 नवंबर को अमेरिका के सैन डिएगो बंदरगाह से रवाना हुआ था। तब से लेकर अब तक इस युद्धपोत और इस पर सवार दल को मोर्चे पर तैनात हुए कुल 259 दिन से अधिक का समय हो चुका है।

इस अत्यधिक लंबी अवधि के दौरान यह विशाल युद्धपोत केवल दो बार ही किसी सुरक्षित ठिकाने पर रुका है। इनमें से एक ठहराव बीते 7 जुलाई को ओमान की एक अत्यंत संक्षिप्त यात्रा के दौरान हुआ था। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और डराने वाली बात यह है कि इस युद्धपोत पर सवार लगभग 5,000 नाविक और मरीन लगातार 208 दिनों से समुद्र के बीच ही फंसे हुए हैं। उन्होंने इतने लंबे समय से सूखी जमीन पर कदम तक नहीं रखा है। यही वो हैरान करने वाला आंकड़ा है जो अब अमेरिकी नौसेना के लिए एक बड़े विवाद और जनाक्रोश की वजह बन गया है।

सैन डिएगो में भड़के सैनिकों के परिवार, नौसेना के सचिव को घेरा

युद्धपोत पर तैनात सैनिकों के सब्र का बांध जब टूट गया, तो उनके परिवारों ने खुद मोर्चा संभालने का फैसला किया। अनादोलू एजेंसी की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, सैन डिएगो में आयोजित एक बैठक के दौरान करीब 200 परिवारों ने अमेरिकी नौसेना के कार्यवाहक सचिव हुंग काओ को सीधे तौर पर घेर लिया और उनसे तीखे सवाल पूछे। अमेरिकी सैन्य व्यवस्था में यह बेहद दुर्लभ और असामान्य घटना मानी जा रही है, क्योंकि आमतौर पर सैनिकों के परिवार इस तरह खुलकर और सार्वजनिक मंचों पर सेना के नेतृत्व के खिलाफ अपना रोष व्यक्त नहीं करते हैं।

सैनिकों के परिजनों ने युद्धपोत पर व्याप्त अत्यधिक थकान, जवानों के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य, पौष्टिक भोजन और पीने के पानी की भारी कमी, प्रदूषित पानी की आशंका, टूटे हुए शौचालयों, सुरक्षा संबंधी कमियों और डाक सेवाओं में अत्यधिक देरी जैसे बेहद गंभीर और बुनियादी मुद्दों पर नौसेना से सीधे जवाब तलब किया।

विमानवाहक पोत पर नारकीय हालात: टूटे टॉयलेट और फफूंद

सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के इस सबसे आधुनिक माने जाने वाले युद्धपोत पर अंदरूनी हालात बेहद नारकीय हो चुके हैं। जहाज पर कई टॉयलेट पूरी तरह टूट चुके हैं और पानी की गुणवत्ता इतनी खराब है कि उसमें गंदगी की आशंका लगातार बनी हुई है। इसके अलावा, सैनिकों के नहाने वाले कमरों में हर तरफ फफूंद जमी हुई पाई गई है।

इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि जहाज के एक हिस्से में पाइपलाइन जाम होने के कारण शौचालय व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई थी। वहीं फफूंद की समस्या पर अधिकारियों का कहना है कि वेंटिवेशन प्रणाली में आई तकनीकी खराबी के चलते अत्यधिक नमी पैदा हो गई थी, जिसके कारण वहां फफूंद जम गई।

केवल बुनियादी स्वच्छता ही नहीं, बल्कि युद्धपोत पर रसद की आपूर्ति भी बुरी तरह चरमरा गई है। सैनिकों के लिए दैनिक उपयोग का सामान, भोजन, पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और उनके परिवारों द्वारा भेजी गई डाक की डिलीवरी समय पर नहीं हो पा रही है। वाइस एडमिरल डगलस वेरिसिमो ने इस बात को स्वीकार किया है कि बहरीन के माध्यम से होने वाली आपूर्ति श्रृंखला में युद्ध की शुरुआत के बाद से ही भारी बैकलॉग बन गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि अब स्थिति में थोड़ा सुधार हो रहा है, लेकिन इसे अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं कहा जा सकता। उन्होंने माना कि कुछ समय के लिए परिस्थितियां वास्तव में बेहद दयनीय हो गई थीं।

घर वापसी की उम्मीदों पर फिरा पानी, कोई तय तारीख नहीं

इस पूरे विवाद के बीच सैनिकों और उनके परिवारों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर यह तनावपूर्ण और थकाऊ तैनाती कब समाप्त होगी? नौसेना प्रशासन ने इस संबंध में बताया है कि वे वर्तमान में यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को मध्य पूर्व भेजने की तैयारी कर रहे हैं, जो वहां पहुंचकर यूएसएस लिंकन की जगह लेगा। इसके बाद ही यूएसएस लिंकन को वापस लौटने की अनुमति मिल सकेगी।

हालांकि, इतनी दलीलें देने के बावजूद नौसेना ने अभी तक यूएसएस लिंकन की वापसी के लिए किसी निश्चित तिथि की घोषणा नहीं की है। सैन्य अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों और 'ऑपरेशनल सिक्योरिटी' का हवाला देते हुए वापसी की तारीख बताने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे परिवारों का गुस्सा और ज्यादा भड़क गया है।

क्या अमेरिकी सेना के भीतर सुलग रही है बगावत की चिंगारी?

युद्धपोत की बदतर स्थिति, जवानों के परिवारों का सरेआम विद्रोह और सैन्य नेतृत्व की विफलता को देखते हुए अब रक्षा विश्लेषकों के बीच यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिकी सेना के भीतर कोई बड़ी बगावत आकार ले रही है? यह आशंका इसलिए भी बलवती हो रही है क्योंकि हाल के दिनों में अमेरिकी सैन्य प्रशासन ने बिना कोई स्पष्ट कारण बताए कई वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया है।

इनमें लेफ्टिनेंट जनरल चार्ल्स कोस्टांजा का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जिन्हें उनका निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने से लगभग दो महीने पहले ही पदमुक्त कर दिया गया। इसके अलावा भी सेना के शीर्ष स्तर पर कई बड़े और अप्रत्याशित फेरबदल किए गए हैं। इन घटनाक्रमों से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि लगातार चल रहे युद्ध और आंतरिक अव्यवस्था के कारण अमेरिकी रक्षा बलों के भीतर भारी असंतोष और अंदरूनी दबाव लगातार बढ़ रहा है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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