अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी संकट, पहली बार राष्ट्रीय कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के पार विश्व एक घंटा पहले 6
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका ने एक नया और चिंताजनक रिकॉर्ड बनाया है, जहां देश का कुल राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर की सीमा को पार कर गया है। बढ़ते सरकारी खर्च और बजट घाटे के बीच यह स्थिति अमेरिकी आर्थिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

40 ट्रिलियन डॉलर का ऐतिहासिक स्तर

अमेरिका की आर्थिक स्थिति को लेकर जारी किए गए ताजा आंकड़े देश के नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी की तरह हैं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से साझा की गई रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को कारोबारी दिन की समाप्ति तक देश का कुल राष्ट्रीय कर्ज 40.047 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह पहली बार है जब अमेरिकी कर्ज ने इस ऐतिहासिक और डरावने आंकड़े को छुआ है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था फिलहाल वित्तीय दबाव के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां सरकारी खर्च और कर्ज का जाल लगातार गहरा होता जा रहा है।

कर्ज का विस्तृत विवरण

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आंकड़ों को यदि बारीकी से समझें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस 40.047 ट्रिलियन डॉलर के कुल कर्ज को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जा सकता है:

  • जनता के पास सरकारी कर्ज: इसमें वह राशि शामिल है जो निवेशक, आम जनता और अन्य वित्तीय संस्थाओं के पास बॉन्ड के रूप में मौजूद है, जिसका मूल्य लगभग 32.266 ट्रिलियन डॉलर है।
  • सरकारी विभागों के बीच उधारी: इसमें लगभग 7.782 ट्रिलियन डॉलर की वह राशि शामिल है जो सरकार ने अपने ही विभिन्न विभागों और सरकारी एजेंसियों के माध्यम से जुटा रखी है।

यह आंकड़ा यह भी दर्शाता है कि सरकार लंबे समय से अपने रोजमर्रा के खर्चों और योजनाओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज पर निर्भर है। यदि हम 2017 के आंकड़ों से वर्तमान स्थिति की तुलना करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज दोगुने से भी अधिक हो गया है।

कर्ज के जाल में फंसने के पीछे की वजह

सवाल यह है कि अमेरिका को इतनी बड़ी उधारी की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? इसका सीधा सा जवाब बजट घाटे में छिपा है। किसी भी अन्य देश की सरकार की भांति, अमेरिका को भी अपने कामकाज के लिए भारी धन की जरूरत होती है। जब सरकार की कुल कमाई (टैक्स और अन्य माध्यमों से) उसके कुल खर्च से कम होती है, तो उस कमी को पूरा करने के लिए उसे बाजार से पैसा उधार लेना पड़ता है। पिछले कई वर्षों से अमेरिकी सरकार का बजट घाटा सालाना लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर स्थिर है।

यह चिंताजनक स्थिति केवल युद्ध या मंदी के समय नहीं, बल्कि सामान्य आर्थिक परिस्थितियों में भी देखी जा रही है। इसका एक प्रमुख कारण कोविड-19 महामारी का काल है। महामारी के दौरान अमेरिकी नागरिकों, व्यापारिक संस्थानों और अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए सरकार ने अरबों-खरबों डॉलर खर्च किए। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2017 के बाद से कर्ज में जो बढ़ोतरी हुई है, उसका करीब एक-तिहाई हिस्सा सीधे तौर पर महामारी के दौर में किए गए खर्चों से संबंधित है।

ब्याज का बोझ और बाजार की स्थिति

बढ़ते कर्ज का सबसे बुरा असर ब्याज के भुगतान पर पड़ रहा है। जितना अधिक कर्ज सरकार ले रही है, उसे चुकाने के लिए उतने ही अधिक ब्याज की आवश्यकता होती है। यदि ब्याज दरें और बढ़ती हैं, तो अमेरिकी खजाने पर दबाव और भी अधिक विकराल हो जाएगा। वर्तमान में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड पिछले दो दशकों के उच्चतम स्तर पर है। इसका कारण यह है कि वैश्विक निवेशक और बाजार प्रतिभागी लगातार बढ़ रहे कर्ज, महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अधिक प्रतिफल यानी रिटर्न की मांग कर रहे हैं। इस अस्थिरता को थामने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सरकारी बॉन्ड की बायबैक योजना को बढ़ाने की घोषणा की है, ताकि बाजार में कुछ हद तक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

आगे की राह: विकल्प और चुनौतियां

अमेरिका के सामने अब बहुत ही सीमित और कठिन विकल्प बचे हैं। बढ़ते हुए कर्ज को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास मुख्य रूप से दो ही रास्ते हैं: या तो सरकारी खर्च में भारी कटौती की जाए, या फिर टैक्स बढ़ाकर सरकारी राजस्व में वृद्धि की जाए। हालांकि, ये दोनों ही कदम राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हैं।

  • सरकारी खर्च कम करने का सीधा असर देश की महत्वपूर्ण योजनाओं और जन-सुविधाओं पर पड़ेगा।
  • टैक्स में बढ़ोतरी करने से आम जनता और बड़े कॉरपोरेट जगत में असंतोष बढ़ सकता है।

कुल मिलाकर, 40 ट्रिलियन डॉलर का यह कर्ज केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक आर्थिक चेतावनी है। यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका को अपने खर्च और आय के बीच की खाई को पाटने के लिए जल्द से जल्द ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे, अन्यथा ब्याज का बढ़ता बोझ अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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