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8 घंटे पहले
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सरकारी विज्ञापनों पर अदालत की बड़ी टिप्पणी
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में करारा झटका लगा है। एक संघीय अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह जनता के पैसे से चलाए जा रहे उन विज्ञापनों का प्रसारण तुरंत बंद करे, जिन्हें लेकर विवाद खड़ा हो गया था। कोर्ट ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा कि करदाताओं के धन का उपयोग सरकार अपने प्रचार प्रसार के लिए नहीं कर सकती है। इस आदेश ने प्रशासन के उस अभियान पर रोक लगा दी है जिसे लेकर लंबे समय से सवाल उठाए जा रहे थे।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती आदेश
यह अंतरिम आदेश संघीय जज जेनिफर रोचोन ने जारी किया है। यह फैसला सरकारी कामकाज पर नजर रखने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन 'कॉमन कॉज' और अन्य समूहों द्वारा दायर की गई एक याचिका पर आधारित है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन विज्ञापनों के जरिए राष्ट्रपति की नीतियों और उनके राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि इसके लिए सरकारी खजाने का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत में यह दलील देने की कोशिश की कि इस मामले को खारिज कर दिया जाना चाहिए क्योंकि विज्ञापन चलाने की अवधि 11 अक्टूबर की रात तक ही थी। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। जज ने स्पष्ट आदेश दिया कि 11 अक्टूबर की शाम 6 बजकर 45 मिनट के बाद इन विज्ञापनों का प्रसारण पूरी तरह रोक दिया जाए।
दो सप्ताह की पाबंदी और आगे की शर्तें
अदालत की ओर से यह रोक फिलहाल दो सप्ताह के लिए लगाई गई है। इस दौरान प्रशासन किसी भी नए विज्ञापन स्लॉट की खरीद नहीं कर सकेगा। यदि सरकार भविष्य में जनता के पैसे का उपयोग करके दोबारा कोई विज्ञापन अभियान शुरू करना चाहती है, तो उसे अदालत से अनुमति लेनी होगी। प्रशासन द्वारा अदालत में प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों के मुताबिक, इस पूरे अभियान पर अब तक लगभग 1.9 करोड़ डॉलर खर्च किए जा चुके हैं, जबकि इस काम के लिए कुल 2 करोड़ डॉलर का बजट निर्धारित किया गया था। यह राशि मुख्य रूप से अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा एजेंसी के फंड से आवंटित की गई थी।
प्रशासन की सफाई और हकीकत
गृह सुरक्षा विभाग की वरिष्ठ अधिकारी हॉली मेरिंगर ने एक शपथपत्र के जरिए स्पष्ट किया कि विज्ञापन एजेंसी ने 11 अक्टूबर तक के लिए स्लॉट बुक किए थे और विभाग ने एजेंसी को इसके बाद किसी भी नई खरीदारी से मना कर दिया था। प्रशासन का अपना पक्ष यह है कि खर्च की गई राशि का उपयोग पहले से बने हुए वीडियो को प्रसारित करने में किया गया है, न कि नए वीडियो बनाने में।
विवाद की असली जड़
प्रशासन की ओर से कुल 13 विज्ञापन तैयार किए गए थे, जिन्हें सीबीएस, सीएनएन, फॉक्स न्यूज और एमएस नाउ जैसे बड़े अमेरिकी टीवी नेटवर्क पर प्रसारित किया गया। सरकार का दावा था कि ये विज्ञापन सीमा सुरक्षा और नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक लगाने से जुड़ी जनहित की जानकारी देने के लिए थे। वहीं, कॉमन कॉज और अन्य आलोचकों का मानना है कि ये विज्ञापन जनहित के बजाय केवल राष्ट्रपति और उनके राजनीतिक एजेंडे का महिमामंडन कर रहे थे। अदालत अब इस कानूनी बिंदु पर गहराई से विचार करेगी कि क्या सरकारी खजाने से वित्त पोषित यह विज्ञापन अभियान वैध सीमाओं के भीतर था या नहीं।
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