अमेरिका से पहले भारत को दहलाना चाहता था ओसामा बिन लादेन, 25 साल बाद CIA के खुफिया दस्तावेजों से हुआ बड़ा खुलासा विश्व 3 घंटे पहले 2
अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमलों की 25वीं बरसी पर सार्वजनिक किए गए CIA के अति-गोपनीय दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि ओसामा बिन लादेन के संभावित आतंकी निशानों की सूची में भारत भी शामिल था।

दुनिया को दहला देने वाले 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले को बीते ढाई दशक यानी 25 साल होने को हैं। इस ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना के इतिहास से जुड़े कई अहम रहस्यों से अब पर्दा उठ रहा है। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी) ने एक अत्यंत संवेदनशील कदम उठाते हुए कई अति-गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है। इन दस्तावेजों से जो जानकारियां छनकर बाहर आ रही हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं और इनमें भारत की सुरक्षा को लेकर उस दौर में मंडरा रहे गंभीर खतरों का भी विस्तृत ब्योरा मिलता है। सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि वैश्विक आतंकी संगठन अल-कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन अमेरिका से भी पहले भारत की धरती पर खून-खराबा करना चाहता था।

सार्वजनिक किए गए इन दस्तावेजों में 28 अगस्त 1998 की एक अमेरिकी प्रेसिडेंशियल खुफिया रिपोर्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इस खुफिया रिपोर्ट में भारत को उन देशों की सूची में प्रमुखता से शामिल किया गया था, जिन्हें ओसामा बिन लादेन अपने संभावित हमलों के निशाने पर रख रहा था। यह खुलासा साफ करता है कि भारत बहुत पहले से ही अल-कायदा की वैश्विक आतंकी साजिशों के सीधे राडार पर था।

खुफिया दस्तावेजों में भारत का नाम और लादेन की साजिश

28 अगस्त 1998 को तैयार की गई इस बेहद खास प्रेसिडेंशियल खुफिया रिपोर्ट का शीर्षक था ‘बिन लादेन टेररिस्ट नेटवर्क स्टिल ए थ्रेट’ यानी बिन लादेन का आतंकी नेटवर्क अब भी एक खतरा है। इस दस्तावेज के अनुसार, लादेन के निशाने पर सिर्फ अमेरिका ही नहीं था, बल्कि वह दुनिया के कई अन्य देशों में भी बड़े स्तर पर आतंकी हमलों को अंजाम देने की फिराक में था। इन देशों की सूची में भारत के साथ-साथ निम्नलिखित देशों के नाम भी शामिल थे:

  • भारत
  • पाकिस्तान
  • मिस्र
  • कुवैत
  • सऊदी अरब
  • यमन
  • युगांडा

हालांकि, इस रिपोर्ट में इस बात का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि भारत के किस विशिष्ट शहर, सैन्य ठिकाने या नागरिक क्षेत्र को निशाना बनाने की योजना बनाई गई थी। रिपोर्ट में हमले की किसी तय तारीख या समय का भी जिक्र नहीं था। न ही इसमें यह स्पष्ट किया गया था कि क्या अल-कायदा भारत में भी उसी तरह के हवाई हमलों या विमान अपहरण जैसी किसी भयावह साजिश को अंजाम देने की योजना बना रहा था, जैसी उसने बाद में अमेरिका में कर दिखाई। लेकिन यह पूरी तरह साफ था कि लादेन की हिट लिस्ट में भारत का नाम दर्ज हो चुका था।

CIA की चेतावनियों को व्हाइट हाउस ने किया था नजरअंदाज?

प्रेसिडेंशियल खुफिया ब्रीफिंग के रूप में जारी किए गए इन 70 से ज्यादा दस्तावेजों में कुल मिलाकर 100 से ज्यादा पन्ने हैं। ये दस्तावेज तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल के दौरान तैयार किए गए थे। इन दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि 9/11 हमले से कई साल पहले ही अमेरिकी खुफिया एजेंसियां व्हाइट हाउस को लगातार आगाह कर रही थीं। ओसामा बिन लादेन और उसके खतरनाक अल-कायदा नेटवर्क से पैदा होने वाले खतरों की हर छोटी-बड़ी जानकारी राष्ट्रपति कार्यालय को नियमित रूप से दी जा रही थी। इसके बावजूद इन खतरों को समय रहते पूरी तरह से टाला नहीं जा सका, जिसका खामियाजा अंततः पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा।

अमेरिकी हमलों के बावजूद भी सक्रिय रहा अल-कायदा का नेटवर्क

इस रिपोर्ट के सामने आने से कुछ समय पहले, अगस्त 1998 में ही अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए अफगानिस्तान में स्थित अल-कायदा के आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर ताबड़तोड़ मिसाइल हमले किए थे। अमेरिकी प्रशासन का मानना था कि इन हमलों से अल-कायदा की कमर टूट जाएगी। लेकिन अमेरिकी खुफिया आकलन ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। खुफिया रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि भारी बमबारी और मिसाइल हमलों के बावजूद ओसामा बिन लादेन और उसके संगठन के कई शीर्ष आतंकी कमांडर सुरक्षित बच निकलने में कामयाब रहे थे।

इतना ही नहीं, अमेरिका के इन हमलों के बाद भी अल-कायदा का संगठन पूरी तरह सक्रिय बना रहा। इस संबंध में रिपोर्ट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई थीं:

  • आतंकी संगठन का आपसी संचार नेटवर्क लगातार सुचारू रूप से काम कर रहा था।
  • मिसाइल हमलों में तबाह हुए कुछ प्रशिक्षण शिविरों में आतंकवादियों ने दोबारा से अपनी गतिविधियां और ट्रेनिंग शुरू कर दी थी।
  • अमेरिकी हमलों से बचने के लिए अल-कायदा ने अपने कई प्रमुख ठिकानों और शिविरों को दूसरी सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट कर लिया था।
  • अल-कायदा का नेटवर्क केवल मध्य पूर्व या दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें उत्तर अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया तक फैल चुकी थीं, जिससे इन क्षेत्रों में अमेरिकी हितों को गंभीर खतरा पैदा हो गया था।

60 देशों में फैला था आतंकियों का जाल

खुफिया रिपोर्ट में अल-कायदा के वैश्विक नेटवर्क की ताकत और उसकी पहुंच को लेकर जो अनुमान लगाए गए थे, वे आज भी सुरक्षा विश्लेषकों को चौंकाते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पूरा अंदेशा था कि ओसामा बिन लादेन दुनिया के कम से कम 60 देशों में फैले अपने सक्रिय सदस्यों, हमदर्दों और सहयोगी संगठनों के दम पर कभी भी और कहीं भी हमला कराने की क्षमता रखता था।

एक और महत्वपूर्ण जानकारी यह भी सामने आई है कि अगस्त 1998 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर मिसाइलें दागीं, तो उस कार्रवाई के महज कुछ घंटे पहले तक भी बिन लादेन अमेरिका और ब्रिटेन के खिलाफ नए और बड़े आतंकी हमलों की साजिश रचने में व्यस्त था। यानी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से लादेन के हौसले पस्त होने के बजाय और बुलंद हो गए थे, और वह लगातार पश्चिमी देशों के खिलाफ साजिशें रचता रहा, जो आगे चलकर और ज्यादा घातक साबित हुईं।

और फिर आया 11 सितंबर 2001 का वो काला दिन

लगातार मिल रही खुफिया चेतावनियों के बीच आखिरकार वह भयानक दिन आ ही गया जिसने आधुनिक इतिहास की दिशा को बदल कर रख दिया। 11 सितंबर 2001 को अल-कायदा के 19 आतंकियों ने अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाते हुए चार यात्री विमानों का अपहरण कर लिया। इसके बाद आतंकवादियों ने इन विमानों को बड़े हथियारों की तरह इस्तेमाल किया:

  • अपहृत किए गए दो विमानों को न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की गगनचुंबी जुड़वां इमारतों से टकरा दिया गया, जिसके बाद देखते ही देखते दोनों इमारतें ढह गईं और हजारों मासूम लोगों की जान चली गई।
  • तीसरे यात्री विमान को वॉशिंगटन के बाहरी इलाके में स्थित अमेरिकी सैन्य मुख्यालय पेंटागन पर गिराया गया, जिससे वहां भी भारी तबाही मची।
  • चौथा विमान पेनसिल्वेनिया के एक मैदान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, इस विमान का संभावित निशाना अमेरिकी लोकतंत्र के प्रतीक व्हाइट हाउस या अमेरिकी संसद की इमारत थी, लेकिन यात्रियों की बहादुरी के कारण आतंकी अपने मंसूबों में पूरी तरह सफल नहीं हो सके।

इस भयावह हमले के 25 साल बाद अब जाकर इन अति-संवेदनशील दस्तावेजों का सार्वजनिक होना इस बात की तस्दीक करता है कि अल-कायदा का नेटवर्क कितना विशाल और सुनियोजित था। साथ ही, यह भारत के लिए भी एक बड़ा सबक है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पनपने वाला आतंकवाद किस तरह दशकों पहले से देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ था।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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