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एक घंटा पहले
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ईरान के साथ टकराव को भले ही ट्रंप अब समेटने की दिशा में बढ़ रहे हों, लेकिन जितनी क्षति वे पहुंचा सकते थे, वह पहुंचा चुके हैं। मिसाइलों और ड्रोन से मचाई गई तबाही तो दुनिया ने देखी, लेकिन ट्रंप ने ईरानी तेल को भी नहीं बख्शा। होर्मुज की नाकेबंदी के पर्दे के पीछे चुपचाप ईरानी तेल चुराने की बात उन्होंने कुछ दिन पहले खुद स्वीकार की थी, और अब यह उजागर हुआ है कि इस चोरी को आखिर अंजाम कैसे दिया गया। इसी चालबाजी की कीमत अमेरिका को अपने एक अपाचे हेलीकॉप्टर के रूप में चुकानी पड़ी।
हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए ट्रंप प्रशासन ने ईरान की ही वह पुरानी और शातिर 'स्मगलिंग तकनीक' अपनाई, जिसके सहारे ईरान सालों तक अमेरिकी प्रतिबंधों को धता बताता आया था।
ओमान और यूएई के समंदर में अमेरिका का 'डार्क फ्लीट' ऑपरेशन
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना मई 2026 की शुरुआत से ही खाड़ी की समुद्री सीमा में एक बेहद गोपनीय 'शिप-टू-शिप' तेल ट्रांसफर ऑपरेशन चला रही है। इस खेल में अमेरिका ने ओमान और यूएई को भी शामिल कर लिया है। सैटेलाइट तस्वीरों और खुफिया सूत्रों के अनुसार, यह पूरा गुप्त नेटवर्क दो खास ठिकानों पर संचालित हो रहा है—पहला, संयुक्त अरब अमीरात में फुजैराह का समुद्री तट और दूसरा, ओमान का अहम 'सोहार' बंदरगाह।
होर्मुज स्ट्रेट के मुहाने पर ईरान ने 'परशियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' नाम की एक नई संस्था बनाकर पूरे इलाके पर अपना नियंत्रण कायम कर रखा है। आदेश न मानने वाले जहाजों पर ईरान की रेवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) सीधे ड्रोन और मिसाइलों से हमला बोल देती है। इसी खतरे से बचने के लिए अमेरिका ने यूएई की सरकारी तेल कंपनी ADNOC और कुवैत ऑयल टैंकर कंपनी के जहाजों को ओमान और फुजैराह के तटों पर बुलाकर चुपके-चुपके तेल का यह खेल शुरू किया।
इसलिए मार गिराया गया अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर
9 जून 2026 को ईरान ने अमेरिका का एक अत्याधुनिक अपाचे हेलीकॉप्टर मार गिराया था, जिसके जवाब में अमेरिका ने ईरान पर पलटवार करते हुए बमबारी भी की थी। उस वक्त असली वजह दुनिया के सामने नहीं थी। अब चार बड़े रक्षा सूत्रों और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने खुलासा किया है कि वह अपाचे किसी सामान्य गश्त पर नहीं, बल्कि इसी गुप्त तेल चोरी और ट्रांसफर मिशन की सुरक्षा में तैनात था।
जिस दिन ईरान ने अमेरिकी अपाचे को मार गिराया, ठीक उसी दिन सैटेलाइट इमेज में ओमान के सोहार बंदरगाह के पास 6 जोड़ी विशालकाय तेल टैंकर आपस में सटे हुए दिखाई दिए थे। हालांकि अमेरिकी रक्षा अधिकारी इसे कैमरे पर मानने से कतरा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि उनकी सेंटकॉम फोर्स ऐसे किसी सीधे काम में शामिल नहीं है, लेकिन सच यही है कि समंदर के ऊपर उड़ते हवाई ड्रोन, वॉटर ड्रोन और यही अपाचे हेलीकॉप्टर उन गुप्त काफिलों को रास्ता दिखा रहे थे। राहत की बात यह रही कि अपाचे के दोनों क्रू मेंबर्स को एक अमेरिकी ड्रोन बोट ने समय रहते बचा लिया।
बत्तियां बुझाकर, ट्रांसपोंडर बंद कर खेला गया आधी रात का खौफनाक खेल
यह ऑपरेशन इतना खतरनाक और गोपनीय था कि इसे पूरी तरह अमेरिकी सेना नियंत्रित कर रही थी। इसे अंजाम देने के लिए एक बेहद सतर्क और शातिर तरीका अपनाया जाता था।
- लाइट्स ऑफ और ट्रांसपोंडर बंद: होर्मुज की ओर बढ़ने वाले तेल टैंकर अपनी सारी बत्तियां बुझा देते हैं और जहाजों की लोकेशन बताने वाले 'ट्रांसपोंडर' को पूरी तरह बंद कर देते हैं, ताकि ईरान के राडार उन्हें पकड़ न सकें।
- दूरी और टाइमिंग: ये जहाज तय मीटिंग पॉइंट पर पहुंचने के बाद एक-दूसरे से ठीक 3,000 से 4,000 मीटर की दूरी बनाकर चलते हैं।
- 30 से 40 घंटे का डेंजर जोन: ईरान के नियंत्रण वाले इलाके से बाहर निकलते ही ये जहाज वहां पहले से खड़े दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकरों VLCCs के बिल्कुल बगल में आकर चिपक जाते हैं। इसके बाद 24 से 40 घंटों तक समंदर की लहरों के बीच एक जहाज से दूसरे में तेल पलटा जाता है।
ट्रंप ने ईरान से कितना तेल चुरा लिया?
जांच के मुताबिक, 11 जून तक करीब 17 जोड़ी जहाज एक साथ इस खतरनाक काम में जुटे हुए थे और मई से अब तक कम से कम 92 जहाज इस गुप्त नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं। इस चोर रास्ते से अमेरिका अब तक 9 करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चा तेल निकाल चुका है। हालांकि युद्ध से पहले रोजाना गुजरने वाले 2 करोड़ बैरल के मुकाबले यह आंकड़ा छोटा है, फिर भी ट्रंप प्रशासन इसके जरिए दुनिया में तेल की आपूर्ति बनाए रखने और महंगाई पर लगाम कसने की पूरी कोशिश कर रहा है।
अमेरिका ने उठाया बहुत बड़ा जोखिम
समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं, बल्कि युद्ध के बीच निकाला गया बेहद जोखिम भरा जुगाड़ है। बिना लाइट और बिना राडार के रात के अंधेरे में तैरते इन विशालकाय जहाजों के आपस में टकराने का गंभीर खतरा हर पल बना रहता है। ट्रंप प्रशासन के लिए इस वक्त नियम-कायदों से ज्यादा अहमियत खाड़ी के तेल पर अपना दबदबा बनाए रखने की है, भले ही इसके लिए उसे ईरान की तरह 'समुद्री डकैतों' वाला हथकंडा क्यों न अपनाना पड़े।
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