ग्राफ्टेड बैंगन की वैज्ञानिक खेती से बदली किसान की किस्मत, बिहार-बंगाल तक भारी मांग और दोगुने मुनाफे की आस छत्तीसगढ़ 2 घंटे पहले 3
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर में एक युवा किसान ने 2 एकड़ में वैज्ञानिक तरीके से ग्राफ्टेड बैंगन की खेती की है। पिछले अनुभव और बिहार-बंगाल में बढ़ी मांग के चलते इस बार दोगुने मुनाफे की उम्मीद है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर के एक युवा किसान ने अपने 2 एकड़ खेत में वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर बैंगन की खेती शुरू की है। उन्होंने रायपुर से बैंगन के ग्राफ्टेड पौधे मंगवाए थे, जिन्हें मई में रोपा गया। किसान के अनुसार रोपाई के 15 से 20 दिनों के बाद फलों की तुड़ाई शुरू हो जाएगी।

युवा किसान को बैंगन की खेती का एक साल का अनुभव है। पिछली बार लागत अधिक रही और मुनाफा भी हुआ, हालांकि उन्हें यह स्पष्ट अंदाजा नहीं रहा कि कितना लाभ मिला। इसी अनुभव से सीख लेते हुए उन्होंने इस बार खेती के तरीके में बदलाव किए हैं। उनके बैंगन की मांग बिहार और बंगाल जैसे बड़े बाजारों में रहती है, जिसके चलते इस बार दोगुने मुनाफे की संभावना जताई जा रही है।

ग्राफ्टेड तकनीक से तैयार हुई फसल

किसान विवेक कुमार गोस्वामी ने बताया कि उन्होंने 26 मई को ग्राफ्टेड बैंगन का रोपण किया था। फिलहाल पौधे 20 दिन से अधिक के हो चुके हैं और इनमें अच्छी बढ़वार के साथ फूल भी आने लगे हैं। उन्होंने बताया कि इस तकनीक में नीचे जंगली बैंगन का रूट स्टॉक और उसके ऊपर वीएआर-212 किस्म का पौधा लगाया जाता है, जिससे फसल अधिक मजबूत और टिकाऊ बनती है।

वैज्ञानिक तरीके से खेत की तैयारी

खेती के लिए खेत में दो बार हल से गहरी जुताई कराई गई और इसके बाद दो बार रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बनाया गया। बेड तैयार करने के बाद गोबर खाद का इस्तेमाल किया गया और मल्चिंग बिछाकर पौधों की रोपाई की गई। इस खेती में बेड से बेड की दूरी 6 फीट और पौधे से पौधे की दूरी 3 फीट रखी गई है।

दो एकड़ में लगाए गए 5000 पौधे

विवेक ने बताया कि उन्होंने रायपुर स्थित चावड़ा बाग नर्सरी से पौधे मंगवाए थे। दो एकड़ के खेत में लगभग 5000 पौधे लगाए गए हैं। अब तक इस खेती में करीब 3 लाख रुपये की लागत आ चुकी है, जबकि आगे निराई-गुड़ाई और पोषण प्रबंधन पर भी खर्च होगा।

गोबर खाद से बेहतर बढ़वार

किसान के मुताबिक इस फसल में मुख्य रूप से गोबर खाद का उपयोग किया गया है। जंगली बैंगन की जड़ मजबूत होने के कारण रासायनिक खाद की जरूरत अपेक्षाकृत कम पड़ती है। हालांकि खेत में घास नियंत्रण और जंगली रूट स्टॉक से निकलने वाली अनावश्यक टहनियों की समय-समय पर छंटाई करना जरूरी होता है।

बिहार से बंगाल तक रहती है मांग

विवेक कुमार गोस्वामी ने बताया कि पिछले वर्ष भी उन्होंने बैंगन की खेती की थी। उस दौरान तैयार फसल की आपूर्ति बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक की गई थी। इसके अलावा सरगुजा क्षेत्र में भी इसकी नियमित मांग बनी रहती है।

इस बार बेहतर मुनाफे की उम्मीद

किसान ने बताया कि पहली बार खेती के दौरान ड्रिप सिंचाई और अन्य व्यवस्थाओं पर अधिक खर्च होने के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका था। लेकिन अनुभव बढ़ने के साथ इस बार उत्पादन और मुनाफा दोनों बेहतर रहने की उम्मीद है।

6 से 8 महीने तक मिलता है उत्पादन

किसान के अनुसार ग्राफ्टेड बैंगन की फसल 45 दिनों में पहली तुड़ाई देने लगती है। इसके बाद हर सप्ताह दो बार तुड़ाई की जा सकती है। उचित पोषण और देखभाल मिलने पर यह फसल 6 से 8 महीने तक लगातार उत्पादन देती रहती है।

चेतन शुक्ला
Official Verified Account

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!