हरियाणा
2 घंटे पहले
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विचारों
कुछ लोग अपने जीवन में ऐसा उदाहरण पेश कर जाते हैं जो सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। विश्व रक्तदाता दिवस के मौके पर अंबाला के एक ऐसे ही व्यक्ति की कहानी चर्चा में है, जिन्होंने रक्तदान को केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि देशभक्ति और मानवता का सबसे बड़ा धर्म मानकर जीवनभर निभाया।
72 वर्षीय राजेंद्र गर्ग ने अब तक 221 बार रक्तदान करके सैकड़ों लोगों को जीवनदान देने में योगदान दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने पूरे परिवार को भी इस अभियान से जोड़कर समाज के सामने एक अनूठी मिसाल कायम की है।
साढ़े 17 साल की उम्र में शुरू हुआ सफर
अंबाला शहर के निवासी राजेंद्र गर्ग की रक्तदान यात्रा उस समय शुरू हुई, जब वह महज साढ़े 17 वर्ष के थे। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान घायल सैनिकों और मरीजों के लिए रक्त की भारी जरूरत थी। उस समय चंडीगढ़ पीजीआई की मेडिकल टीम अंबाला पहुंची और लोगों से रक्तदान की अपील की। देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर राजेंद्र गर्ग ने तभी पहली बार रक्तदान किया।
उस एक फैसले ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और रक्तदान उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। लोकल 18 से बातचीत में राजेंद्र गर्ग बताते हैं कि उनका सपना भारतीय वायुसेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था, लेकिन पारिवारिक हालात के चलते वह ऐसा नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि देश की सेवा केवल सीमा पर जाकर ही नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर भी की जा सकती है। इसी सोच ने उन्हें रक्तदान के क्षेत्र में लगातार सक्रिय बनाए रखा।
‘शादी से पहले पूछा- क्या रक्तदान करती हैं?’
रक्तदान के प्रति उनकी निष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी शादी के समय भी इसे प्राथमिकता दी। जब वह अपनी होने वाली पत्नी को देखने पहुंचे, तो सबसे पहला सवाल यही पूछा कि क्या वह रक्तदान करती हैं। पत्नी के 'नहीं' कहने पर उन्होंने साफ कह दिया था कि शादी के बाद उन्हें रक्तदान करना होगा।
यही वजह रही कि शादी के बाद जब दोनों हनीमून के लिए कश्मीर रवाना होने वाले थे, तो सबसे पहले चंडीगढ़ पीजीआई पहुंचे, जहां उनकी पत्नी ने पहली बार रक्तदान किया और इसके बाद ही दोनों अपनी यात्रा पर निकले।
पूरा परिवार बना रक्तदाता
राजेंद्र गर्ग की प्रेरणा का असर उनके परिवार पर भी पड़ा। उनके बेटे और बेटी, दोनों नियमित रक्तदाता बन गए। बेटी ने नौकरी के दौरान भी कई लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया और बाद में उनके दामाद भी इस अभियान से जुड़ गए।
आज पूरा परिवार रक्तदान को सामाजिक जिम्मेदारी मानकर निभा रहा है। परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर अब तक 379 यूनिट रक्तदान किया है।
‘जरूरतमंद की जान बचाना सबसे बड़ा पुण्य’
राजेंद्र गर्ग का कहना है कि रक्तदान करने से उन्हें हमेशा मानसिक और शारीरिक संतुष्टि मिली है। उनका मानना है कि किसी जरूरतमंद की जान बचाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं हो सकता। वह बताते हैं कि नियमित रक्तदान के बावजूद आज भी वह पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें कभी किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का सामना नहीं करना पड़ा।
उनके अनुसार, रक्तदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने की जरूरत है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस नेक काम से जुड़ सकें। रक्तदान के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है। रेड क्रॉस की ओर से सबसे अधिक रक्तदान करने वालों की सूची में उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया गया है। उनके घर में विभिन्न संस्थाओं से मिले सम्मान पत्र और ट्रॉफियां आज भी उनकी सेवा भावना की कहानी कहती हैं।
समय-समय पर लगवाते हैं रक्तदान शिविर
राजेंद्र गर्ग बताते हैं कि वह समय-समय पर अंबाला में रक्तदान शिविरों का आयोजन भी करवाते हैं। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक रक्त इकट्ठा कर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाना है। उनका मानना है कि समाज के लिए किया गया हर काम अंततः किसी न किसी रूप में समाज को ही मजबूत बनाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने एक कविता भी लिखी है, जिसकी पंक्तियां आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं—
जो होते हैं दूसरों पे कुर्बान, उनके चेहरे पे रहती है सदा मुस्कान। साल में होते हैं क्वॉर्टर चार, चार बार रक्त देकर बन जा सुपर स्टार। बुझती ज्योति को जगा दे, उजड़ते दामन को बसा दे, मिली है जिन्दगी कर नेक काम, अल्लाह भी करेंगे तेरे पूर्ण काम, रक्तदाता है महान, रक्तदाता है महान।
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