अब हर खेत नहीं, सिर्फ रोगग्रस्त फसल पर ही दवा का छिड़काव! खेती में आया AI से लैस ड्रोन भारत एक घंटा पहले 2
नए जमाने के एडवांस ड्रोन पहले GPS, NVDI और क्रॉप मॉनिटरिंग कैमरे से खेत और फसल की स्कैनिंग करते हैं, फिर बीमारी या पोषक तत्वों की कमी वाले हिस्से की पहचान कर सिर्फ वहीं सटीक छिड़काव करते हैं। इससे किसानों का समय, श्रम और दवा तीनों की बचत होती है।

खेती-किसानी में अब किसान आधुनिक तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं और इसके जरिए अच्छी आमदनी भी हासिल कर रहे हैं। इन्हीं तकनीकों में ड्रोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि इससे श्रम और समय दोनों की बचत होती है। अब तक आमतौर पर देखा जाता था कि ड्रोन पूरे खेत या आम-लीची के बागान पर एक समान छिड़काव कर देते थे। लेकिन अब बाजार में ऐसे एडवांस्ड तकनीक वाले ड्रोन आ चुके हैं, जो पहले खेत और फसल को स्कैन करते हैं, समस्या वाले हिस्से की पहचान करते हैं और फिर ठीक उसी जगह दवा छिड़कते हैं। यही वजह है कि यह तकनीक किसानों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

किसानों के लिए उपलब्ध हुआ एडवांस तकनीक वाला ड्रोन

कृषि विज्ञान केंद्र, बेगूसराय के यंत्र विशेषज्ञ विकास कुमार ने बताया कि अब नई पीढ़ी के ड्रोन सामने आ चुके हैं, जिन्हें एडवांस टेक्नोलॉजी का ड्रोन कहा जाता है। ये ड्रोन GPS, NVDI तकनीक और क्रॉप मॉनिटरिंग कैमरे से लैस होते हैं। कमांड मिलते ही ये खेत की मैपिंग करते हैं और फसल की स्थिति का विश्लेषण करते हैं।

स्कैनिंग के दौरान जहां कहीं बीमारी, पोषक तत्वों की कमी या कोई अन्य समस्या होती है, वहां अलग रंग के संकेत दिखाई देने लगते हैं। इसके बाद ड्रोन ठीक उसी हिस्से पर सटीक तरीके से छिड़काव करता है। इसके लिए ड्रोन में पहले से कमांड तय कर दिए जाते हैं कि उसे क्या और कैसे काम करना है। इससे किसानों का समय और श्रम दोनों बचते हैं—जो काम पहले घंटों में होता था, वह अब कुछ मिनटों में पूरा हो जाता है। साथ ही दवा की बचत होती है और फसल पर उसका असर भी बेहतर तरीके से पहुंचता है।

कीमत जानकर चौंक जाएंगे, पर बचत का रास्ता भी मौजूद

विकास कुमार के मुताबिक, अगर कोई किसान अकेले यह ड्रोन खरीदना चाहता है तो उसे 4 से 5 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। वहीं किसान उत्पादक संगठन (FPO), कस्टम हायरिंग सेंटर या स्वयं सहायता समूह के माध्यम से यही ड्रोन करीब 2 से 3 लाख रुपये में मिल सकता है।

किसानों के लिए 10 लीटर क्षमता वाला ड्रोन बेहतर विकल्प माना जा रहा है। इसमें लिथियम बैटरी का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे पूरी तरह चार्ज होने में करीब 90 मिनट का समय लगता है। एक बार चार्ज होने पर यह ड्रोन 15 से 20 मिनट तक लगातार काम कर सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बैटरी 30 प्रतिशत से नीचे जाने से पहले ही ड्रोन को सुरक्षित रूप से लैंड करा लेना चाहिए।

बीमारी पहचानकर वहीं करता है छिड़काव

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह ड्रोन सिर्फ उड़कर पूरे खेत में दवा नहीं बिखेरता। मिले हुए कमांड के आधार पर जिस बीमारी को निशाना बनाने के लिए कहा जाता है, यह उसी पर निशाना साधता है। सॉफ्टवेयर की मदद से यह बीमारी वाले हिस्सों की पहचान करता है और मैपिंग पूरी होने के बाद ठीक उसी जगह छिड़काव करता है जहां जरूरत होती है। इससे दवा की बर्बादी घटती है और खेती और अधिक वैज्ञानिक बनती जाती है।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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