कर्ज के बोझ से दबा 28 वर्षीय किसान, सुसाइड नोट में लिखी आपबीती; पीछे छोड़ गया परिवार भारत एक घंटा पहले 3
महाराष्ट्र के लातूर में कर्ज और निजी फाइनेंस कंपनियों की प्रताड़ना से तंग आकर 28 वर्षीय युवा किसान ने अपनी जान दे दी। उसने सुसाइड नोट में अपना कर्ज माफ करने और परिवार की मदद करने की गुहार लगाई है।

कर्ज और सूखे का कहर

महाराष्ट्र में खेती के संकट और सूखे की मार ने एक बार फिर एक युवा किसान की जिंदगी छीन ली है। लातूर जिले के शिरूर अनंतपाल तालुका स्थित अंकुलगा राणी गांव से एक बेहद दुखद मामला सामने आया है। यहां 28 वर्षीय किसान दत्ता सूर्यकांत कुंभार ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली है। दत्ता पर निजी फाइनेंस कंपनियों का भारी कर्ज था, जिससे वह लंबे समय से परेशान चल रहे थे। इस घटना ने एक बार फिर किसानों की बदहाली और उन पर मंडरा रहे आर्थिक संकट की गंभीर स्थिति को उजागर किया है।

क्या है पूरा मामला

दत्ता सूर्यकांत कुंभार खेती के साथ-साथ दुकान भी चलाते थे, लेकिन फसल की बर्बादी और व्यापार में आई गिरावट के कारण वह कर्ज के चक्रव्यूह में फंस गए थे। उन पर कुल 6 लाख 20 हजार रुपये का कर्ज था। कर्ज का बोझ इतना अधिक था कि उन्होंने इसे चुकाने की असमर्थता में मौत का रास्ता चुन लिया। पुलिस के अनुसार, उन्होंने अपने ही घर में फंदे से लटककर खुदकुशी की। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लिया और उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा है।

सुसाइड नोट में दर्द की दास्तां

आत्महत्या से पहले दत्ता ने एक सुसाइड नोट छोड़ा है, जिसमें उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा और दुखों को बयां किया है। उन्होंने साफ तौर पर फाइनेंस कंपनियों द्वारा दी जा रही मानसिक प्रताड़ना का जिक्र किया है। सुसाइड नोट में दत्ता ने लिखा है कि दुकान की खराब स्थिति और फाइनेंस कंपनियों के लगातार दबाव के कारण वह खुदकुशी करने पर मजबूर हैं। उन्होंने उन चार संस्थानों के नाम भी लिखे हैं जिनसे उन्होंने कर्ज लिया था:

  • Equitas Bank
  • Shriram Finance
  • Ring App
  • HDB Nilanga

अपने नोट में उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा है, मैं सरकार से विनती कर रहा हूं कि मेरे और मेरे परिवार को और अधिक परेशानी न हो। मेरा लोन माफ कर दिया जाए और मेरे परिवार की उचित आर्थिक मदद की जाए।

बेसहारा हुआ परिवार

इस हादसे के बाद दत्ता का परिवार पूरी तरह से टूट चुका है। उनके पीछे उनकी बूढ़ी मां, पत्नी और दो छोटे मासूम बच्चे रह गए हैं, जिनके सिर से पिता का साया उठ गया है। अब गांव और इलाके में यही चर्चा है कि आखिर कब तक किसान कर्ज के बोझ तले दबकर अपनी जान देते रहेंगे। प्रशासन की तरफ से इस पीड़ित परिवार की मदद और संबल देने की मांग जोर पकड़ रही है।

सरकार के आश्वासन और हकीकत

किसानों की बदहाली का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले सितंबर महीने में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लातूर का दौरा किया था और सूखे से बर्बाद हुई सोयाबीन की फसल का जायजा लिया था। उस दौरान एक किसान की आंखों में आंसू देखकर मुख्यमंत्री ने उन्हें गले लगाकर ढांढस बंधाया था और सरकार की तरफ से हरसंभव सहायता का वादा किया था। हालांकि, जमीन पर हालात अभी भी बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। दत्ता की मौत ने एक बार फिर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट कर दिया है। क्या वाकई अब यह परिवार सरकार की मदद का हकदार बनेगा, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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