उपनाम: सांस्कृतिक विरासत
फरीदाबाद में मिथिला समाज की जीवंत परंपरा, घास की झोपड़ी में पूरे होते हैं मृत्यु के बाद के संस्कार
फरीदाबाद के सेक्टर-8 स्थित मिथिलांचल काली मंदिर में 70 वर्षीय पूरण मंडल घास, बांस और मूंज की रस्सियों से वह झोपड़ी तैयार करते हैं, जिसमें मिथिला समाज मृत्यु के बाद के सभी धार्मिक रीति-रिवाज निभाता है। पिछले 20 वर्षों से यह काम कर रहे पूरण मंडल इस सदियों प...
प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के दौर में भी जीवंत है करौली के हटवारा बाजार की लकड़ी कारीगरी
करौली का हटवारा बाजार आज भी पारंपरिक लकड़ी के खिलौनों और घरेलू वस्तुओं की पहचान बनाए हुए है, जो 10 से 20 परिवारों की आजीविका का सहारा हैं। महंगाई के बावजूद यहां 20 से 100 रुपये तक के हस्तनिर्मित खिलौने उपलब्ध हैं।
मिथिला की सदियों पुरानी वंशावली परंपरा को सहेज रहे पूर्णिया के विद्यानंद झा, जिनमें दर्ज है पूरा इतिहास
पूर्णिया के विद्वान विद्यानंद झा उर्फ मोहन झा करीब 500 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण कर रहे हैं। इस अहम कार्य के लिए जिला प्रशासन ने उन्हें सम्मानित भी किया है।