विश्लेषण: टीएमसी के बाग‍ियों ने क्‍यों चुनी एक गुमनाम पार्टी? यही चाल ममता के लिए भी राहत बनी राष्ट्रीय राजनीति 3 घंटे पहले 2
काकोली घोष दास्‍तीदार समेत 21 सांसदों का गुट टीएमसी पर दावा ठोकने के बजाय 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी' में विलय कर रहा है। जानकारों के मुताबिक यह दांव कानूनी झंझटों से बचने का रास्‍ता है, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी, नाम और चुनाव चिह्न भी सुरक्षित रह गए।

टीएमसी का बागी गुट जिस नई पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी' में विलय करने जा रहा है, वही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू है। अगर यह गुट सीधे टीएमसी पर कब्‍जे का दावा करता, तो उसके सामने तमाम कानूनी चुनौतियां खड़ी हो जातीं। ऐसा लगता है कि ये नेता इतना लंबा इंतजार करने को तैयार नहीं थे, इसलिए वे एक ऐसी पार्टी में जा मिले जिसे आम जनता जानती तक नहीं।

ममता बनर्जी के साथ करीब 40 साल तक सियासत करने वालीं काकोली घोष दास्‍तीदार ने रविवार को जैसे ही यह घोषणा की कि वह 21 सांसदों के साथ 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी' में विलय कर रही हैं, हर कोई हैरान रह गया। सवाल यही उठा कि आखिर एक अनजान पार्टी ही क्‍यों चुनी गई?

दो तिहाई सांसद होने के बावजूद टीएमसी पर दावा क्‍यों नहीं?

जब इस गुट के पास दो तिहाई सांसद थे और 60 से ज्‍यादा विधायकों का समर्थन भी हासिल था, तो उसने सीधे टीएमसी पर दावा क्‍यों नहीं ठोका? कानून के मुताबिक किसी पार्टी के दो तिहाई सांसद अलग हो जाएं तो वे पार्टी तोड़ सकते हैं और उस पर कब्‍जा कर सकते हैं। शिवसेना का शिंदे गुट और अजित पवार वाली एनसीपी इसी रास्‍ते पर चल चुके हैं। फिर भी टीएमसी के बागियों ने ऐसी पार्टी का दामन थामा, जिसका नाम तक जनता ने नहीं सुना।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कानूनी पचड़ों के डर से बचने के लिए ही इन नेताओं ने यह राह चुनी। अगर बागी गुट चुनाव आयोग के पास जाकर खुद को 'असली टीएमसी' बताता, तो वहीं से लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो जाती। दलबदल कानून यानी एंटी डिफेक्‍शन लॉ कहता है कि पार्टी पर कब्‍जा करने के लिए दो तिहाई बहुमत जरूरी है, और इसके बाद कुछ और पेच हैं जिन्‍हें पहले चुनाव आयोग और फिर सुप्रीम कोर्ट में साबित करना पड़ता है।

बागी गुट अच्छी तरह जानता था कि टीएमसी पर कब्‍जे की लड़ाई में उलझने पर उसे सालों तक अदालतों और चुनाव आयोग के चक्‍कर लगाने होंगे, वकीलों की पूरी फौज खड़ी करनी पड़ेगी और उसकी सारी ऊर्जा सिर्फ खुद को 'असली' साबित करने में ही खप जाएगी।

महाराष्ट्र के शिंदे-पवार मॉडल से लिया सबक

टीएमसी के बागियों ने महाराष्ट्र से बड़ा सबक लिया। एकनाथ शिंदे और अजित पवार को अपनी-अपनी पार्टियों शिवसेना और एनसीपी का नाम तथा चुनाव चिह्न हासिल करने में काफी मशक्‍कत करनी पड़ी। इस कानूनी खींचतान के चलते जनता के बीच भी भ्रम का माहौल बना रहा।

टीएमसी के बागी इसी उलझन से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी में विलय कर खुद को एक वैध राजनीतिक दल का हिस्‍सा बना लिया। अब उन पर दलबदल कानून की तलवार उतनी आसानी से नहीं लटकेगी, क्‍योंकि विलय की स्थिति में कानून के नियम अलग और कुछ लचीले होते हैं। अब स्‍पीकर भी उन्‍हें तुरंत सदन में अलग गुट के रूप में मान्‍यता दे देंगे और कहीं चक्‍कर काटने की जरूरत नहीं रहेगी।

तो क्‍या बीजेपी कर रही है 'खेला'?

विलय की घोषणा से पहले जिस तरह सभी सांसद बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे और निशिकांत दुबे भी उनके साथ रहे, उससे यह साफ है कि पूरी कहानी बीजेपी के दरवाजे से होकर गुजर रही है। जानकार कह रहे हैं कि असली 'खेला' बीजेपी ही कर रही है।

बीजेपी को संसद में कई बड़े बिल पास कराने हैं और वह जानती है कि अगर ये बागी कानूनी पचड़ों में उलझ गए तो उसके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। बीजेपी नहीं चाहती कि जो बागी इस वक्‍त उसके साथ हैं, वे कोर्ट-कचहरी के फेर में पड़कर बेकार साबित हो जाएं।

क्‍या डीलिमिटेशन ही असली वजह है?

बीजेपी आने वाले समय में डीलिमिटेशन बिल और महिला आरक्षण संशोधन बिल जैसे कई अहम विधेयक सदन में पेश करने वाली है, जिन पर भारी बवाल होना तय माना जा रहा है। कुछ दिन पहले भी सदन में ऐसा हंगामा देखा जा चुका है, जब हालात यहां तक पहुंच गए कि बिल पास ही नहीं हो पाया।

अगर बागी गुट टीएमसी के नाम पर लड़ता रहता, तो वह व्हिप के उल्लंघन के मामलों में फंस सकता था। अलग और नई पार्टी भले ही अनजान हो, लेकिन उसके बन जाने से अब यह गुट संसद में अपना खुद का व्हिप जारी कर सकेगा और बीजेपी के पक्ष में वोट दे पाएगा।

ममता बनर्जी ने क्‍यों ली राहत की सांस?

इस पूरे खेल में ममता बनर्जी ने राहत की सांस ली होगी। उन्‍हें सबसे बड़ा डर इसी बात का था कि बागी गुट टीएमसी का चुनाव चिह्न छीन लेगा, या चुनाव आयोग ने अगर सिंबल फ्रीज कर दिया तो भारी भ्रम फैलेगा और एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

लेकिन बागियों के एक अनजान पार्टी में चले जाने से ममता की पार्टी, उनका नाम और उनका चुनाव चिह्न पूरी तरह सुरक्षित रह गए। अब ममता बनर्जी बंगाल की जनता के बीच जाकर छाती ठोककर कह सकती हैं कि गद्दारों ने पार्टी छोड़ दी, मगर वे टीएमसी पर कब्‍जा नहीं कर पाए। वे बागियों को भगोड़ा और बिकाऊ साबित कर सकती हैं।

बागियों के जाने से ममता और अभिषेक बनर्जी की पार्टी के भीतर पकड़ और मजबूत हो गई है, और भीतरघात का खतरा भी कम हुआ है। कानूनी लड़ाई से मुक्ति मिलने के कारण अब ममता अपना पूरा ध्‍यान बंगाल में टीएमसी को फिर से खड़ा करने में लगा सकती हैं।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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