राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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दुनिया के तीन प्रमुख सुन्नी मुस्लिम बहुल देशों, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर मक्का में एक बड़ा त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता किया है, जिसे मक्का पैक्ट का नाम दिया गया है। इस समझौते के तहत तीनों देशों ने सहमति जताई है कि किसी भी एक देश पर होने वाला सैन्य हमला, तीनों देशों पर सीधा हमला माना जाएगा। इस करार में आने वाले समय में कुछ अन्य सुन्नी देशों के भी शामिल होने की प्रबल संभावना व्यक्त की गई है। हालांकि, यह समझौता इन देशों के आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए किया गया है, लेकिन वैश्विक कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के जानकारों के अनुसार, यह गठजोड़ भारत के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी साबित हो सकता है।
मक्का पैक्ट: क्या है यह सुरक्षा समझौता?
मक्का में हुआ यह ऐतिहासिक सुरक्षा समझौता तीनों देशों की सेनाओं और रणनीतिक विभागों के बीच एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। इस पैक्ट के अंतर्गत सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत लागू किया गया है, जिसका सीधा मतलब है कि यदि किसी तीसरे पक्ष द्वारा इनमें से किसी भी देश की संप्रभुता को चुनौती दी जाती है, तो बाकी दोनों देश उसकी सैन्य और रणनीतिक सहायता के लिए बाध्य होंगे। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस त्रिपक्षीय सैन्य और रणनीतिक नजदीकी के दूरगामी प्रभाव होंगे। विशेष रूप से दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के सुरक्षा समीकरणों में इससे बड़े बदलाव आने की आशंका है, जो भारत के लिए चिंता का विषय बन गए हैं।
भारत के लिए सुरक्षा चिंताओं का नया दौर
इस सुन्नी त्रिपक्षीय गठजोड़ के सैन्य और रणनीतिक प्रभाव तो महत्वपूर्ण हैं ही, लेकिन सबसे अधिक चिंता भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों की संभावित गतिविधियों और उनके नेटवर्क के विस्तार को लेकर है। पाकिस्तान स्थित खूंखार आतंकी संगठन जैसे लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के तार अतीत में भी सऊदी अरब और तुर्की से जुड़ते रहे हैं। एक प्रमुख मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को अब इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि क्या इस नए समझौते के बाद इन आतंकी संगठनों को सऊदी अरब और तुर्की में अपने नेटवर्क का विस्तार करने का नया जरिया मिल सकता है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का इतिहास रहा है कि वह अपने सहयोगियों की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ साजिशें रचने के लिए करता रहा है।
दिल्ली मेट्रो स्टेशन धमाका और तुर्की का संदिग्ध कनेक्शन
तुर्की और पाकिस्तान के बीच आतंकी सांठगांठ का खतरा महज एक आशंका नहीं है, बल्कि इसके पुख्ता सबूत भी सामने आ चुके हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 10 नवंबर 2025 को लाल किला मेट्रो स्टेशन के बाहर हुआ भीषण आत्मघाती विस्फोट इसी खतरनाक गठजोड़ का एक बड़ा उदाहरण है। इस आतंकवादी हमले में उमर उन नबी नामक एक आतंकी ने TATP विस्फोटक का इस्तेमाल कर खुद को उड़ा लिया था। इस भीषण धमाके में कम से कम 15 बेकसूर लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 20 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
जांच एजेंसियों की तफ्तीश में जो तथ्य सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले थे। जांच में खुलासा हुआ कि आत्मघाती हमलावर उमर उन नबी और उसके एक मुख्य सहयोगी मुजम्मिल शकील ने साल 2022 में तुर्की की राजधानी अंकारा की यात्रा की थी। तुर्की यात्रा के दौरान इन दोनों ने कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद से जुड़े अपने आकाओं और हैंडलरों से गुप्त मुलाकातें की थीं। एजेंसियों की पूछताछ और जांच में यह बात भी उजागर हुई कि आतंकियों के निशाने पर चांदनी चौक में स्थित ऐतिहासिक गौरी शंकर मंदिर था, जिसे वे दहलाना चाहते थे।
तुर्की से जुड़ी आतंकी साजिशों का पुराना इतिहास
भारत की सुरक्षा के लिए तुर्की की धरती का आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी तुर्की से जुड़ी आतंकी साजिशों ने सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा है। अगस्त 2022 में रूसी खुफिया एजेंसी FSB ने मध्य एशियाई मूल के एक संदिग्ध आतंकवादी को हिरासत में लिया था। जांच के दौरान यह पता चला कि इस संदिग्ध को तुर्की के इस्तांबुल शहर में इस्लामिक स्टेट (IS) के एक शीर्ष आतंकी कमांडर ने भारत में आत्मघाती हमला करने के उद्देश्य से भर्ती किया था और वहीं पर उसे सुसाइड अटैक की कड़ी ट्रेनिंग दी गई थी।
रूसी खुफिया एजेंसी FSB के अनुसार, यह संदिग्ध शुरू में ऑनलाइन माध्यमों से कट्टरपंथ के जाल में फंसा था और फिर ट्रेनिंग के लिए तुर्की गया था। रूस ने इस संवेदनशील मामले की कुछ सीमित लेकिन बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा की थीं, जिससे भारत में होने वाले एक बड़े संभावित हमले को टाला जा सका था।
सऊदी अरब से पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की फंडिंग
भारत के लिए इस नए त्रिपक्षीय समझौते में सऊदी अरब का शामिल होना भी एक बड़ी आर्थिक चिंता का विषय है। पाकिस्तान स्थित कई आतंकी संगठनों को सऊदी अरब से वित्तीय सहायता यानी टेरर फंडिंग मिलने का एक लंबा इतिहास रहा है। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में जन्मे महमूद अहमद बहाजीक को सऊदी अरब में सक्रिय रहकर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के लिए भारी मात्रा में धन और फंड जुटाने का दोषी पाया गया था। इसी देशविरोधी गतिविधि के कारण साल 2008 में संयुक्त राष्ट्र ने बहाजीक को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था।
सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान की खुफिया व्यवस्था से जुड़े संदिग्ध तत्वों ने अतीत में खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को गुमराह करने, उनका ब्रेनवॉश करने और उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल करने की लगातार कोशिशें की हैं।
1990 का दशक और अफगानिस्तान का सबक
यदि इतिहास पर नजर डालें, तो 1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान और अन्य कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान के माध्यम से सऊदी अरब के पैसे का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। इसी कालखंड के दौरान वैश्विक आतंकी संगठन अल-कायदा का तेजी से विस्तार हुआ। इसी दौर में अफगानिस्तान के खोस्त, जलालाबाद और कंधार जैसे दुर्गम क्षेत्रों में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे भारत विरोधी संगठनों ने पाकिस्तान की मदद से अपने मजबूत प्रशिक्षण शिविर स्थापित किए थे, जहां भारत के खिलाफ आतंकियों को प्रशिक्षित किया जाता था।
भारत के लिए अब आगे की राह
हालांकि, यह भी एक सच है कि सऊदी अरब ने समय-समय पर भारत के साथ अपने बेहतर द्विपक्षीय संबंधों का सम्मान करते हुए पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी नेटवर्क पर कार्रवाई की है और कई मामलों में भारत की मदद भी की है। लेकिन अब रियाद, इस्लामाबाद और अंकारा के बीच बनी इस नई रणनीतिक और सैन्य त्रिकोणीय नजदीकी ने भारत के लिए एक नया सुरक्षा परिदृश्य तैयार कर दिया है।
भारतीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को निम्नलिखित चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी निगरानी को और अधिक मजबूत करना होगा:
- आतंकी फंडिंग के स्रोत: क्या मक्का पैक्ट के बाद खाड़ी देशों और तुर्की से पाकिस्तान समर्थित संगठनों को होने वाली अवैध फंडिंग फिर से बढ़ सकती है?
- ऑनलाइन कट्टरपंथ और भर्ती: सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकी संगठनों में भर्ती करने की कोशिशों पर पैनी नजर रखनी होगी।
- विदेशी नेटवर्क पर नजर: खाड़ी देशों और यूरोपीय देशों में सक्रिय भारत विरोधी तत्वों की गतिविधियों पर नजर रखना अब अनिवार्य हो गया है।
सऊदी अरब और तुर्की के साथ पाकिस्तान का यह नया सैन्य गठजोड़ भारत के लिए कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर एक गंभीर चुनौती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय विदेश नीति और सुरक्षा एजेंसियां इस उभरते हुए खतरे से निपटने के लिए क्या रणनीति तैयार करती हैं।
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