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9 घंटे पहले
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नीलगिरी में बाघ का आतंक और आदमखोर होने का खुलासा
हाल ही में तमिलनाडु के नीलगिरी के जंगलों से एक भयावह खबर सामने आई, जहां एक बाघ ने दो लोगों पर हमला कर उन्हें अपना शिकार बनाया। वन विभाग के अधिकारियों को घटनास्थल पर ऐसे ठोस सबूत मिले, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि बाघ ने न केवल इंसानों पर हमला किया, बल्कि उनके शरीर के कुछ हिस्सों को खा भी लिया। इस दुखद घटना के बाद वन विभाग ने आधिकारिक तौर पर उस बाघ को आदमखोर घोषित कर दिया है। फिलहाल, वन विभाग की विशेष टीम इस खतरनाक वन्यजीव की तलाश में जुटी है।
बाघ के इन हमलों की कड़ी में पहली घटना 9 अगस्त को सामने आई, जब एम. बालाकृष्णन नाम के एक व्यक्ति का शव बरामद हुआ, जो आधा खाया हुआ था। इसके कुछ दिन बाद 21 अगस्त को के. रविकुमार नामक व्यक्ति को बाघ ने अपना शिकार बनाया, जिनका शव उनके घर से महज 200 मीटर की दूरी पर पाया गया। गुडलूर के जिला वन अधिकारी पी. देवराज के अनुसार, दोनों शवों पर मौजूद चोटों के निशान और बाघ द्वारा अंगों को खाए जाने की पुष्टि ने इसे आदमखोर साबित कर दिया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही घटनाओं वाली जगहों से मिले पगमार्क (बाघ के पंजों के निशान) एक समान हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि दोनों हमलों के पीछे एक ही बाघ का हाथ है। इसी तरह की स्थिति हाल ही में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और बहराइच में भी देखी गई थी, जहां भेड़ियों के हमलों से कई लोगों की जान गई थी और उन्हें भी आदमखोर घोषित किया गया था।
आदमखोर घोषित करने के कानूनी मानक
भारत में किसी जंगली जानवर को आदमखोर करार देना इतना आसान नहीं है। इसके लिए बेहद सख्त कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होता है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 (WLPA) की धारा 11 और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत नियम स्पष्ट हैं। केवल एक बार इंसानों पर हमला करने भर से किसी बाघ को आदमखोर नहीं माना जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों की आवश्यकता होती है और मुख्य वन्यजीव वार्डन की औपचारिक अनुमति अनिवार्य है।
WLPA की धारा 11 के अनुसार, किसी जानवर को मारने का निर्णय तभी लिया जा सकता है जब उसे जीवित पकड़ने के तमाम प्रयास विफल हो चुके हों। कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि यदि जानवर को पकड़ने की नौबत आए, तो उसे न्यूनतम शारीरिक कष्ट हो।
आदमखोर का सही अर्थ क्या है?
आसान शब्दों में समझा जाए तो किसी जंगली जीव का एक या दो बार इंसान पर हमला करना उसे आदमखोर की श्रेणी में नहीं लाता। आदमखोर वह जानवर होता है जो बार-बार और योजनाबद्ध तरीके से घात लगाकर इंसानों का शिकार करता है और उन्हें अपना भोजन बनाता है। यह व्यवहार उसकी आदतों में शामिल हो जाता है, जिससे वह मानव बस्तियों के लिए खतरा बन जाता है।
NTCA की नई शब्दावली और सुरक्षा के नियम
साल 2019 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने 'आदमखोर' शब्द के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। सनसनी फैलने से रोकने के लिए अब 'आदमखोर' के स्थान पर इंसानी ज़िंदगी के लिए ख़तरनाक शब्दावली का उपयोग किया जाने लगा है।
नए दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी बड़ी बिल्ली (बाघ या तेंदुआ) को खतरनाक घोषित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाएं जरूरी हैं:
- कैमरा-ट्रैप के जरिए मिले स्पष्ट सबूत।
- डीएनए (DNA) विश्लेषण की रिपोर्ट।
- एक विशेष समिति का गठन, जिसमें गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के सदस्य भी शामिल हों।
यह प्रक्रिया किसी भी जानलेवा कदम को उठाने से पहले पूरी करना अनिवार्य है। प्रशासन का पहला प्रयास हमेशा जानवर को पकड़ने का रहता है और उसे मारने का फैसला सबसे अंतिम और आखिरी विकल्प के तौर पर लिया जाता है, भले ही हमलों में लोगों की जान ही क्यों न गई हो।
जानवरों के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट का नजरिया
जंगली जानवरों के कानूनी अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत इंसानों को मिलने वाले मौलिक अधिकार जानवरों पर लागू नहीं होते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि जानवरों का कल्याण एक जायज संवैधानिक और कानूनी विषय है। इसके बावजूद, भारत का वन्यजीव संरक्षण कानून इंसानों के मुकाबले वन्यजीवों के संरक्षण को अधिक प्राथमिकता देता है, जिसका मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखना है।
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