भारत
एक घंटा पहले
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प्रदर्शनों के दौरान लाठी का इस्तेमाल
हाल ही में रांची में जेपीएससी और जेएसएससी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया, जिसमें कई विद्यार्थी घायल हुए। इसी तरह 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने बल प्रयोग किया। देश में अक्सर राजनीतिक संगठनों, छात्र समूहों और अन्य प्रदर्शनकारियों के आंदोलनों के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज की खबरें सामने आती रहती हैं। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा अपनाया जाने वाला यह एक प्रमुख तरीका है, जिसे चेतावनी और वाटर कैनन के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
पुलिस की लाठी: सामग्री और पारंपरिक बनावट
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस की हर लाठी लकड़ी की ही होती है और इससे लगने वाली चोट को लेकर जो आम धारणाएं हैं, उनमें कितनी सच्चाई है। पारंपरिक रूप से भारत में पुलिस बल बांस या बेंत की लाठी का उपयोग करते आए हैं। हालांकि, इसे महज एक लकड़ी का टुकड़ा समझना गलत होगा क्योंकि अलग-अलग राज्यों और पुलिस इकाइयों में इनकी डिजाइन और सामग्री की गुणवत्ता अलग-अलग होती है। पुरानी लाठियां आमतौर पर बांस से बनाई जाती थीं, जो लंबी, काफी मजबूत और वजन में हल्की होती थीं। बेंत का उपयोग इसे अधिक मजबूती और भारीपन देने के लिए किया जाता था, जिससे यह एक लंबे समय तक व्यावहारिक उपकरण के रूप में बनी रही।
लाठी के नुकसान और चुनौतियां
प्राकृतिक सामग्री जैसे बांस या बेंत के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इनकी मजबूती हर लाठी में एक जैसी नहीं होती थी। साथ ही, लंबे समय तक इस्तेमाल करने और अलग-अलग मौसमों के प्रभाव के कारण इनमें दरारें पड़ सकती थीं या ये टूट भी सकती थीं। पुडुच्चेरी सरकार के दिशा-निर्देशों और पुलिस ड्रिल मैनुअल के अनुसार, लाठी को केवल भीड़ को हटाने का साधन नहीं, बल्कि पुलिस प्रशिक्षण में एक रक्षात्मक उपकरण के रूप में देखा जाता है। लकड़ी की लाठी का उपयोग शरीर के संवेदनशील हिस्सों पर होने से गंभीर चोट, कट, सूजन या नील पड़ने का खतरा रहता है। चोट की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि लाठी का वजन कितना है, मारने वाले का बल क्या है और शरीर के किस हिस्से पर प्रहार किया गया है।
आधुनिक पॉलीकार्बोनेट बैटन की विशेषताएं
समय के साथ पुलिस बलों ने आधुनिक बैटन का उपयोग बढ़ा दिया है। पॉलीकार्बोनेट एक उच्च तकनीक वाला एक इंजीनियरिंग थर्मोप्लास्टिक है, जो लकड़ी से पूरी तरह भिन्न है। गृह मंत्रालय और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों जैसे सीआरपीएफ के मानकों के अनुसार, विशेष रूप से महिला पुलिसकर्मियों के लिए तैयार किए गए इन बैटनों को हल्का, लचीला और आसानी से ले जाने योग्य बनाया गया है। उदाहरण के तौर पर, एक निर्धारित मॉडल में इनकी लंबाई लगभग 900 मिमी और वजन 300 ग्राम से कम होता है। दिल्ली पुलिस ने भी करीब दस साल पहले लकड़ी की लाठियों को हटाकर पॉलीकार्बोनेट बैटन को अपनाना शुरू कर दिया था।
क्या बैटन से चोट कम लगती है
कई लोग यह मानते हैं कि पॉलीकार्बोनेट बैटन से शरीर पर चोट के निशान नहीं पड़ेंगे, लेकिन यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। आधुनिक बैटन का डिजाइन और वजन पारंपरिक लाठियों की तुलना में इस प्रकार रखा जाता है कि वह प्रहार के दौरान चोट के जोखिम को कुछ हद तक सीमित कर सके। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि इनसे कोई खतरा नहीं है। सिर, गर्दन, रीढ़ की हड्डी और छाती जैसे संवेदनशील हिस्सों पर लगने वाली किसी भी प्रकार की लाठी या बैटन की चोट घातक हो सकती है। इसका असर व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य और प्रहार की तीव्रता पर सीधे तौर पर निर्भर करता है। संक्षेप में, लाठी और बैटन दोनों ही कानून व्यवस्था बनाए रखने के उपकरण हैं, जिनका उपयोग परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तरीके से किया जाता है।
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