राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
4
विचारों
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद अहम रुख अपनाया है। देश की शीर्ष अदालत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े हर पहलू की विस्तार से जांच करेगी। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं ने आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, तो मुख्य न्यायाधीश ने संक्षिप्त लेकिन प्रभावी टिप्पणी करते हुए कहा कि, हमें सब पता है. हम जांच करेंगे.
मामले की अगली सुनवाई और प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तारीख तय की है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे चुनाव आयोग द्वारा दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे पर अपना विस्तृत जवाब अगले 10 दिन के भीतर जमा करें। यह पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य आरोप है कि SIR जैसे महत्वपूर्ण निर्णय अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना ही ले लिए गए थे, जबकि आयोग ने इन दावों को पूरी तरह से नकार दिया है।
अभिषेक मनु सिंघवी की मांग
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के अन्य नेताओं की ओर से अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी उपस्थित हुए। उन्होंने बहस के दौरान जोर देकर कहा कि इस पूरे विवाद का केंद्र चुनाव आयोग की निर्णय लेने वाली प्रक्रिया है। सिंघवी ने अदालत से आग्रह किया कि वह चुनाव आयोग को सभी संबंधित फाइल नोटिंग और आंतरिक संवादों को सुरक्षित रखने का निर्देश दे। उन्होंने तर्क दिया कि यह जानना अनिवार्य है कि आखिर ये फैसले लेने से पहले क्या विचार-विमर्श हुआ था, क्या अन्य चुनाव आयुक्तों से राय ली गई थी या नहीं, और क्या ये निर्णय वास्तव में सर्वसम्मति से लिए गए थे। फाइल नोटिंग इन सवालों का जवाब पाने का एकमात्र जरिया हो सकती है।
चुनाव आयोग का जवाब और सर्वसम्मति का दावा
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक संयुक्त हलफनामा दाखिल किया गया, जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के हस्ताक्षर थे। आयोग ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि SIR से संबंधित सभी आदेश पूर्ण सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। हलफनामे में विस्तार से बताया गया है कि 24 जून 2025 को जारी शुरुआती आदेश के साथ-साथ 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी आदेशों के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये निर्णय संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत लिए गए हैं। आयोग ने अपने 248 पन्नों के विस्तृत हलफनामे में अपनी पूरी प्रक्रिया का बचाव किया है।
फॉर्म-6 को लेकर बढ़ा विवाद
सुनवाई के दौरान राज्यसभा सांसद डोला सेन की याचिका का विषय भी प्रमुखता से उठा। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि बिहार में SIR के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग का यह दावा भ्रामक है कि इन परिवर्तनों को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिली थी। गुरुस्वामी ने आयोग के दावों पर कड़े सवाल खड़े किए और कहा कि आयोग के हलफनामे ने खुद ही याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं को पुख्ता कर दिया है।
हालांकि, चुनाव आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल बयानबाजी करार दिया। आयोग ने फिर से दोहराया है कि वैधानिक फॉर्म-6 में किसी भी प्रकार का कोई बदलाव नहीं किया गया है। अब अदालत को यह तय करना है कि दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए विरोधाभासी दावों में से वास्तविकता क्या है। अदालत ने डोला सेन की इस नई याचिका पर आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया में नोटिस जारी होने का मतलब आरोपों की पुष्टि होना नहीं होता, बल्कि यह जांच का एक हिस्सा है।
अखबारी रिपोर्ट से शुरू हुआ बवंडर
इस पूरे मामले की जड़ में सितंबर 2026 में 'द इंडियन एक्सप्रेस' अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट है। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों के भीतर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार अपनी असहमति या आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों का कहना था कि कई महत्वपूर्ण आदेश उनकी पूर्व जानकारी या परामर्श के बिना ही लागू कर दिए गए।
इन दावों के सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक कर डाली। हालांकि, चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर अपने इन फैसलों को सर्वसम्मत बताते हुए इन विवादों को खारिज किया है। आने वाली 17 नवंबर की सुनवाई में अब अदालत यह तय करेगी कि क्या आयोग के फैसलों की प्रक्रिया वाकई पारदर्शी और सर्वसम्मत थी या इसमें कोई प्रक्रियात्मक चूक हुई है।
Comments
0 comment