मनोरंजन
एक महीने पहले
36
विचारों
ओड़िया सिनेमा को लगा गहरा झटका
ओड़िया फिल्म जगत के लिए एक दुखद खबर सामने आई है। प्रसिद्ध और अनुभवी सिनेमैटोग्राफर दिलीप रे अब हमारे बीच नहीं रहे। वे 72 वर्ष के थे। उनके परिवार के सदस्यों ने शनिवार को इस दुखद घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि शुक्रवार की रात भुवनेश्वर स्थित एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। दिलीप रे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनकी मृत्यु से पूरे ओड़िया फिल्म उद्योग में शोक का माहौल व्याप्त है।
दिलीप रे के योगदान को याद कर रहे दिग्गज
सिनेमा जगत के अलावा राजनीतिक गलियारों से भी उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। दिलीप रे अपने पीछे पत्नी और तीन बेटियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने दिलीप रे को कला और संस्कृति के क्षेत्र का एक बड़ा स्तंभ बताया। मुख्यमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा कि ओड़िया फिल्म इंडस्ट्री को संवारने में दिलीप रे का जो योगदान रहा है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
ओड़िया फिल्म इंडस्ट्री को समृद्ध करने में उनके असाधारण कलात्मक योगदान हमेशा याद रखे जाएंगे। उनका जाना हमारी कला और संस्कृति की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
फिल्म निर्माण में अद्भुत सफर
दिलीप रे का जन्म 27 जुलाई 1954 को कटक में हुआ था। अपनी शिक्षा के दौरान उन्होंने दार्जिलिंग के सेंट जोसेफ कॉलेज से स्नातक किया, इसके बाद कलकत्ता के जे.सी.सी. कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की डिग्री ली और मद्रास से M.B.A. की पढ़ाई भी पूरी की। सिनेमैटोग्राफी के क्षेत्र में कदम रखने से पहले उन्होंने बेंगलुरु के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (FTI) से विशेष प्रशिक्षण लिया था।
पुरस्कार और उपलब्धियों से भरा करियर
अपने लंबे और सफल करियर के दौरान दिलीप रे ने अपनी कला का लोहा मनवाया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी के लिए कुल 5 बार ओडिशा स्टेट फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने काम के जरिए ओड़िया सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके कार्य अनुभव की बात करें तो उन्होंने:
- 80 से अधिक ओड़िया फीचर फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी की है।
- लगभग 15 बंगाली फिल्मों में अपना हुनर दिखाया है।
- कई छत्तीसगढ़ी फिल्मों के अलावा डॉक्यूमेंट्री और टेलीविजन धारावाहिकों में भी योगदान दिया है।
दिलीप रे की प्रमुख ओड़िया फिल्मों में 'तिसंध्या', 'बाजे बैंसी नाचे घुंगुरा', 'चाका भौंरी', 'ई ता दुनिया', 'ममता रा डोरा', 'माझी पहाचा' और 'बिधिरा बिधाना' जैसी चर्चित फिल्में शुमार हैं। उनकी रचनात्मक दृष्टि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
Comments
0 comment