राजस्थान
एक घंटा पहले
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15 साल का लंबा संघर्ष और सरकारी दफ्तरों के चक्कर
राजस्थान के राजसमंद जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जो सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है। एक ठेकेदार पिछले करीब 15 साल से अपनी मेहनत की कमाई पाने के लिए नगर परिषद के दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। यह मामला तब चर्चा में आया जब थक-हारकर ठेकेदार ने अदालत की शरण ली और कोर्ट के आदेश पर नगर परिषद कार्यालय में कुर्की की कार्रवाई करने के लिए अधिकारी पहुंच गए। हालांकि, ऐन वक्त पर नगर परिषद प्रशासन ने भुगतान के लिए मोहलत मांग ली, जिसके बाद फिलहाल इस कार्रवाई पर रोक लग गई है।
साल 2011 में की थी पानी की सप्लाई
यह पूरा मामला ठेकेदार बद्रीलाल भोई से जुड़ा है। बद्रीलाल के अनुसार, यह पूरी कहानी वर्ष 2011 में शुरू हुई थी। उस दौरान राजसमंद शहर भीषण जल संकट से जूझ रहा था। उस कठिन समय में नगर परिषद की जिम्मेदारी पर बद्रीलाल भोई ने शहरवासियों की प्यास बुझाने का बीड़ा उठाया था। उन्होंने टैंकरों के माध्यम से शहर के विभिन्न इलाकों में पानी की सप्लाई सुनिश्चित की थी। उन्होंने अपनी तरफ से काम पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ समय पर पूरा किया, ताकि शहर की जनता को राहत मिल सके।
12 लाख का काम, सिर्फ 3 लाख का भुगतान
पीड़ित ठेकेदार बद्रीलाल भोई का कहना है कि उन्होंने उस वक्त कुल 12 लाख रुपये के आसपास का काम किया था। दुर्भाग्यवश, काम पूरा होने के बावजूद उन्हें अपनी पूरी मेहनत की राशि नहीं मिल सकी। अब तक उन्हें केवल 3 लाख रुपये का भुगतान ही प्राप्त हुआ है। शेष बची हुई भारी-भरकम राशि के लिए वे पिछले 15 वर्षों से नगर परिषद के अधिकारियों के पास आवेदन लेकर जाते रहे हैं। उन्होंने अनगिनत बार दफ्तरों के चक्कर लगाए और अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन उन्हें हर बार केवल कोरे आश्वासन ही मिले। इस दौरान कई आयुक्त आए और चले गए, लेकिन किसी ने भी उनकी फाइल पर ध्यान नहीं दिया, जिसके चलते भुगतान का मामला फाइलों में ही दबा रह गया।
कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मची हलचल
जब बद्रीलाल भोई को लगा कि प्रशासन उनकी सुध लेने वाला नहीं है, तो उन्होंने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कुर्की के आदेश जारी कर दिए। इसी क्रम में कोर्ट के कर्मचारी राधेश्याम के नेतृत्व में एक दल नगर परिषद कार्यालय पहुंचा। जैसे ही दफ्तर में कुर्की की कार्रवाई की जानकारी पहुंची, नगर परिषद प्रशासन में हड़कंप मच गया। कोर्ट के आदेश की तामील करने के लिए जैसे ही अधिकारी सक्रिय हुए, परिषद की व्यवस्था डगमगाती हुई दिखाई दी।
आयुक्त ने मांगी पांच दिन की मोहलत
नगर परिषद के आयुक्त विजेश मंत्री ने अदालत के हस्तक्षेप के बाद स्थिति को भांपते हुए तुरंत कदम उठाए। उन्होंने कोर्ट के कार्मिकों को लिखित प्रार्थना पत्र सौंपकर बकाया भुगतान के लिए पांच दिन का अतिरिक्त समय मांगा है। आयुक्त के इस अनुरोध के बाद फिलहाल कुर्की की कार्रवाई को पांच दिन के लिए टाल दिया गया है। अब पूरे शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या निर्धारित पांच दिनों के भीतर ठेकेदार को उसका बकाया पैसा मिल पाएगा, या फिर प्रशासन एक बार फिर से पुरानी चाल चलकर भुगतान को लटका देगा।
बड़ा सवाल: मेहनत का पैसा पाने के लिए 15 साल क्यों?
इस पूरे मामले ने स्थानीय लोगों के बीच एक गंभीर चर्चा छेड़ दी है। सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने सरकारी काम को पूरी ईमानदारी से पूरा किया है, तो उसे अपने ही पैसे के लिए डेढ़ दशक तक क्यों इंतजार करना पड़ा? बद्रीलाल भोई का दर्द साफ झलक रहा है कि उन्होंने अपना कर्तव्य तो बखूबी निभाया था, लेकिन प्रशासन ने उनके साथ न्याय करने में कोताही बरती। फिलहाल, मामले में अदालत की दखल के बाद नई हलचल जरूर देखी जा रही है, लेकिन असली राहत ठेकेदार को तब मिलेगी जब उनके खाते में लंबित राशि जमा होगी। अगले पांच दिन यह तय करेंगे कि नगर परिषद इस जिम्मेदारी को निभाती है या मामला एक बार फिर कानूनी पेचीदगियों में फंस जाएगा।
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