अमेरिका
एक घंटा पहले
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विचारों
अमेरिका की ट्रंप सरकार ने समंदर पर नजर रखने वाले एक बड़े प्रोजेक्ट को बंद करने का ऐलान कर दिया है। इस व्यवस्था को ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव (OOI) के नाम से जाना जाता है। बीते दस साल से यह प्रोजेक्ट अटलांटिक और प्रशांत महासागर की हर पल की जानकारी जुटा रहा था। इसमें करीब 900 एडवांस सेंसर और अंडरवाटर ग्लाइडर लगे हुए हैं, जो समुद्र के तापमान और खतरनाक लहरों पर निगरानी रखते हैं।
नेशनल साइंस फाउंडेशन ने अचानक इस पूरे प्रोजेक्ट को रोकने का निर्णय लिया है। अगले 15 महीनों के भीतर अलास्का और वाशिंगटन के तटों से इसके उपकरण निकाल लिए जाएंगे। वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसे समय में यह फैसला बेहद जोखिम भरा है, जब दुनिया भर के महासागर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेल रहे हैं और एक भयंकर अल नीनो की आशंका मंडरा रही है।
क्या है यह अनोखा सिस्टम जो समंदर की गहराई में काम करता है?
ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव की शुरुआत साल 2016 में हुई थी। इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत लगभग 368 मिलियन डॉलर है और इस भारी बजट को नेशनल साइंस फाउंडेशन ने फंड किया था। इसे समुद्र की सबसे कठोर परिस्थितियों को झेलने के लिहाज से तैयार किया गया था।
गहरे पानी में दबाव बहुत अधिक होता है और खारा पानी मशीनों को जल्द खराब कर देता है, फिर भी यह व्यवस्था इन सभी चुनौतियों से निपटने में सक्षम रही। इसमें लगाए गए करीब 900 एडवांस सेंसर रियल टाइम डेटा सीधे वैज्ञानिकों तक पहुंचाते हैं। इसमें ऑटोमैटिक अंडरवाटर ग्लाइडर भी शामिल हैं, जो बिना किसी इंसानी मदद के समंदर में तैरते रहते हैं और पानी के भीतर होने वाले छोटे से छोटे बदलाव तक को दर्ज कर लेते हैं।
इस पूरे नेटवर्क को तीस साल तक चलाने के हिसाब से डिजाइन किया गया था। इसका मुख्य काम समुद्र के तापमान और रसायन शास्त्र पर नजर रखना था। यह समुद्री इकोसिस्टम में आने वाले बदलावों को भी ट्रैक करता था, जिससे वैज्ञानिक मौसम के बड़े बदलावों को पहले ही भांप लेते थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस सिस्टम के हटते ही रिसर्च का काम पूरी तरह ठप पड़ जाएगा और आने वाली पीढ़ियों को समुद्र की गहराइयों का जरूरी डेटा नहीं मिल पाएगा।
अल नीनो और रिकॉर्ड गर्मी के बीच इसे क्यों हटाया जा रहा है?
नेशनल साइंस फाउंडेशन ने 21 मई को एक चौंकाने वाला बयान जारी किया था, जिसमें कहा गया कि वे इस बड़े प्रोजेक्ट का आकार छोटा करने जा रहे हैं। अगले 15 महीनों में समुद्र से सभी उपकरण बाहर निकाल लिए जाएंगे। अलास्का और वाशिंगटन के तटों के अलावा नॉर्थ कैरोलिना और ग्रीनलैंड के पास से भी उपकरण हटाए जाएंगे।
फाउंडेशन के मीडिया प्रमुख माइक इंग्लैंड ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम नई टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया है। सरकार अब उभरती हुई वैज्ञानिक प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान देना चाहती है। लेकिन वैज्ञानिक इस तर्क से बिल्कुल सहमत नहीं हैं।
इस समय दुनिया भर के महासागर सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। समुद्र का तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है, जिसके चलते बेहद तेज और विनाशकारी तूफान आ रहे हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण समुद्री जीवों का अस्तित्व खतरे में है और साथ ही एक बहुत ताकतवर अल नीनो की आशंका सामने आ रही है, जो पूरी दुनिया के मौसम को बदलकर रख देता है। ऐसे नाजुक वक्त में निगरानी रोक देना किसी बड़ी आफत को न्योता देने जैसा है। ट्रंप प्रशासन पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह क्लाइमेट साइंस को कमजोर करना चाहता है और समंदर में माइनिंग का रास्ता साफ कर रहा है।
वो कौन सी जलधारा है जिसके रुकने से दुनिया में तबाही आ सकती है?
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता अटलांटिक महासागर की एक खास जलधारा को लेकर है, जिसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन यानी एमोक कहा जाता है। यह जलधारा समंदर के भीतर बहने वाली एक विशाल नदी की तरह है और पूरी दुनिया के तापमान व मौसम को नियंत्रित करने में मदद करती है।
यह गर्म पानी को उत्तरी इलाकों की ओर ले जाती है, जहां पानी ठंडा होकर नीचे बैठ जाता है और फिर वापस दक्षिण की तरफ बहता है। इसी वजह से इसे समुद्र का सबसे बड़ा ग्लोबल वॉर्मिंग स्विच माना जाता है। नई रिसर्च बताती है कि यह व्यवस्था अब कमजोर पड़ रही है और वैज्ञानिकों को डर है कि यह जलधारा इसी सदी में पूरी तरह रुक सकती है।
अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया में महाविनाश देखने को मिल सकता है। अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगेगा, जिससे तटीय शहरों में भयानक बाढ़ आ जाएगी। यूरोप के देशों में रिकॉर्ड तोड़ कड़ाके की ठंड पड़ने लगेगी, वहीं अफ्रीका के कई बड़े हिस्सों में सालों तक भयानक सूखा छाया रहेगा।
ओशियन ऑब्जर्वेटरी इनिशिएटिव का डेटा इसी जलधारा को समझने में बहुत मददगार साबित हो रहा था। सिस्टम बंद होने से वैज्ञानिक पूरी तरह अंधेरे में पहुंच जाएंगे। जर्मनी की पोट्सडैम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टीफन रामस्टॉर्फ ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा, ‘समंदर में हो रहे बदलावों पर नजर रखना इस समय सबसे ज्यादा जरूरी है।’
स्थानीय मछुआरों और समुद्री व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?
इस प्रोजेक्ट के बंद होने का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ेगा। अमेरिका के प्रशांत उत्तर-पश्चिमी तट पर रहने वाले मछुआरे इसी डेटा पर निर्भर हैं। वहां का कोस्टल एंड्योरेंस एरे लगातार पानी में ऑक्सीजन के स्तर को मापता है, जो डांजनेस केकड़े की आबादी पर नजर रखने के लिए बेहद जरूरी है। पानी में ऑक्सीजन घटते ही केकड़ों की मौत होने लगती है, और मछुआरे इसी जानकारी के आधार पर तय करते हैं कि उन्हें कब और कहां शिकार करना है। क्वीनॉल्ट इंडियन नेशन के आदिवासी मछुआरे भी इसी डेटा के सहारे अपनी आजीविका चलाते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन की प्रोफेसर जैन न्यूटन इस सिस्टम की देखरेख करती हैं। उन्होंने बताया कि इस महीने के अंत तक 11 जरूरी उपकरण पानी से बाहर निकाल लिए जाएंगे, जिसके बाद मछुआरों के पास समंदर की सटीक जानकारी पाने का कोई जरिया नहीं बचेगा।
यह व्यवस्था सिर्फ मछलियों की जानकारी ही नहीं देती थी। इसके बुए समुद्र में चल रहे जहाजों को मौसम की सटीक चेतावनी भी देते थे। खतरनाक लहरों और तूफानों की समय रहते मिलने वाली जानकारी से नाविकों की जान बचती थी। अब डेटा के अभाव में समुद्री व्यापार को भी बड़ा नुकसान हो सकता है और जहाजों के कैप्टन बिना किसी पूर्व चेतावनी के भयंकर तूफानों में फंस सकते हैं।
ट्रंप के इस फैसले पर वैज्ञानिकों की क्या प्रतिक्रिया है?
वैज्ञानिक इस फैसले को लेकर ट्रंप सरकार से बेहद नाराज हैं। बाइडेन सरकार के दौरान नेशनल ओशियनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख रहे रिक स्पिनरैड ने कहा, ‘यह फैसला पैसे की मामूली बचत के लिए बहुत बड़ा नुकसान करने जैसा है।’ उनके मुताबिक यह सिस्टम देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से बड़ा फायदा पहुंचा रहा था, फिर चाहे वह तूफान की भविष्यवाणी हो या बाढ़ से बचाव।
वैज्ञानिकों का तर्क है कि टैक्सपेयर्स के पैसों से तैयार हो चुके सिस्टम को नष्ट करना समझदारी नहीं है। ब्रिटेन की प्लाइमाउथ मरीन लेबोरेटरी की वैज्ञानिक हेलेन फिंडले ने भी चिंता जताते हुए कहा, ‘समंदर लगातार बदल रहा है और उसमें बड़े खतरे पैदा हो रहे हैं।’
कुछ नेताओं का आरोप है कि ट्रंप सरकार फॉसिल फ्यूल कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती है। सीनेटर शेल्डन वाइटहाउस ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फॉसिल फ्यूल लगातार समंदर को गर्म कर रहा है, इसलिए ट्रंप के लोग इस निगरानी को ही बंद कर देना चाहते हैं ताकि सच सामने न आ सके। व्हाइट हाउस की तरफ से अब तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
क्या समंदर की आंखें बंद होने से दुनिया का मौसम बेकाबू हो जाएगा?
इस बड़े सिस्टम को हटाने का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक इस डेटा का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि समुद्र में आने वाले बड़े बदलावों को ट्रैक करने का यह अकेला जरिया था। लॉन्ग टर्म डेटा मिलना बंद होते ही मौसम के पूर्वानुमान कमजोर पड़ जाएंगे।
वैज्ञानिक यह नहीं जान पाएंगे कि समंदर में गर्मी किस रफ्तार से बढ़ रही है। कोरल ब्लीचिंग यानी समुद्री मूंगों के मरने की गति को ट्रैक करना नामुमकिन हो जाएगा और समुद्री चक्रवातों की ताकत का अंदाजा लगाना भी मुश्किल होगा। ओशियन कंजर्वेंसी के क्रिस रॉबिंस ने कहा कि इस फैसले से देश के सामने एक बड़ा ब्लाइंड स्पॉट खड़ा हो जाएगा और हम भूकंप व तूफानों की भविष्यवाणी करने की क्षमता खो देंगे।
ट्रंप सरकार इस समय क्लाइमेट साइंस से जुड़े फंड घटाने में लगी है और साथ ही गहरे समंदर में माइनिंग शुरू करने की योजना भी बना रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि माइनिंग कंपनियों को फायदा पहुंचाने के मकसद से ही इस मॉनिटरिंग सिस्टम को हटाया जा रहा है। अगर समंदर की आंखें बंद कर दी गईं तो आने वाले संकटों से निपटने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। ऐसे दौर में जब दुनिया भर के देश क्लाइमेट चेंज से मिलकर लड़ रहे हैं, अमेरिका का यह पीछे हटने वाला कदम बाकी देशों को भी निराश करेगा। वैज्ञानिक रिसर्च में आई यह रुकावट आने वाले कई दशकों तक महसूस की जाएगी।
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