तृणमूल कांग्रेस पर वर्चस्व की जंग: सोमवार को चुनाव आयोग के सामने आमने-सामने होंगे ममता और ऋतब्रत गुट पश्चिम बंगाल 3 महीने पहले 135
तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पहली बार पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न 'घास-फूल' और संपत्तियों पर मालिकाना हक को लेकर ममता बनर्जी और बागी ऋतब्रत बनर्जी गुट चुनाव आयोग के समक्ष अपनी दावेदारी पेश करेंगे।

तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े सांगठनिक संकट से जूझ रही है। पार्टी पर वर्चस्व और इसके नियंत्रण की यह लड़ाई अब सोमवार को एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाली है। दल के नाम, इसके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न 'घास-फूल' और पूरे सांगठनिक ढांचे पर अपना मजबूत दावा ठोकने के लिए दोनों ही विरोधी गुट निर्वाचन आयोग के समक्ष अपने-अपने अहम दस्तावेज पेश करने जा रहे हैं। पार्टी के करीब 28 साल के लंबे इतिहास में यह पहला मौका है जब राजनीतिक वैधता और सांगठनिक नियंत्रण हासिल करने के लिए ऐसा असाधारण मुकाबला देखा जा रहा है। दोनों ही खेमे खुद को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस साबित करने में जुटे हैं।

चुनाव आयोग के सामने साक्ष्यों की जंग

पिछले सप्ताह दोनों विरोधी पक्षों की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद, निर्वाचन आयोग ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया था। आयोग ने दोनों ही पक्षों को निर्देश दिया था कि वे छह जुलाई को शाम 5.30 बजे तक अपने-अपने दावे से जुड़े दस्तावेजी सबूत, सांगठनिक रिकॉर्ड और समर्थन की सूची जमा कराएं। इस विवाद की मुख्य जड़ पार्टी का चुनाव चिह्न, इसकी भारी-भरकम चल-अचल संपत्तियां, फंड और इसके मुख्यालय पर नियंत्रण हासिल करना है। हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी को मिली हार के बाद से ही बगावत की चिंगारी भड़की थी, जिसने अब इस बड़े विवाद का रूप ले लिया है।

सांगठनिक विरासत बनाम संख्या बल का मुकाबला

इस कानूनी और राजनीतिक लड़ाई में दोनों ही पक्षों की रणनीतियां बिल्कुल अलग हैं। एक ओर जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला कालीघाट खेमा पार्टी की शुरुआत से चली आ रही सांगठनिक निरंतरता और अपनी ऐतिहासिक विरासत पर भरोसा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ बागी खेमा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच अपने संख्या-बल को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रहा है। पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में इसे सबसे बड़ा टकराव माना जा रहा है। यह पूरा संकट शुरुआत में केवल विधायी स्तर पर कुछ विधायकों के असंतोष के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन अब यह पार्टी के समूचे अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है।

विधायकों की बड़ी बगावत और समानांतर ढांचा

इस अभूतपूर्व संकट की शुरुआत पिछले महीने तब हुई जब बागी धड़े ने पार्टी लाइन से अलग जाकर एक विशेष सत्र का आयोजन किया। इस बैठक में उन्होंने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष घोषित कर दिया और साथ ही एक समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व का ढांचा भी तैयार कर लिया। बागी नेताओं का तर्क था कि वर्तमान नेतृत्व ने अपने अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधियों का विश्वास पूरी तरह खो दिया है। बागी गुट ने अपनी वास्तविक ताकत तब दिखाई जब उन्होंने विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का पुरजोर समर्थन किया। तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को सिरे से खारिज कर दिया। वर्तमान में बागी गुट का दावा है कि उन्हें लगभग 65 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।

संसद से लेकर मुख्यालय तक मचा घमासान

बागी खेमे की यह बगावत केवल राज्य विधानसभा तक ही सीमित नहीं रही। लोकसभा में भी पार्टी को तब बड़ा झटका लगा जब काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 21 लोकसभा सांसदों ने बागी रुख अपनाते हुए 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) का दामन थाम लिया। इस कदम ने संसद के भीतर ममता बनर्जी की स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया है।

इस अंदरूनी कलह में शुक्रवार को एक और बेहद नाटकीय मोड़ तब आया जब बागी गुट के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता स्थित पार्टी के मुख्य दफ्तर 'तृणमूल भवन' पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने कार्यालय के ताले बदल दिए, वहां अपने नए पोस्टर चिपका दिए और घोषणा की कि अब से वे इसी भवन से पार्टी का कामकाज चलाएंगे। यह कदम उस वक्त उठाया गया जब इसके ठीक एक दिन पहले बागी गुट के नेताओं ने नई दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों से मिलकर पार्टी के नाम और संपत्तियों पर अपना दावा ठोका था।

दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें

ऋतब्रत गुट के एक वरिष्ठ नेता ने पूरे मामले पर विश्वास जताते हुए कहा कि उन्होंने अपने दावों को साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेजी सबूत जुटा लिए हैं और वे इन्हें आयोग के सामने रखेंगे। उन्हें पूरा भरोसा है कि आयोग का फैसला तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर उनके पक्ष में ही आएगा।

दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट खेमे ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जिन नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है, उन्हें निर्वाचन आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का कोई कानूनी हक नहीं है। हालांकि, अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, कालीघाट खेमा भी इस बात को स्वीकार कर रहा है कि चुनाव आयोग का यह फैसला पार्टी के भविष्य को तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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