टीएमसी में टूट के मामले में स्पीकर ओम बिरला फूंक-फूंक कर रख रहे कदम, दोनों गुटों का पक्ष सुनकर होगा फैसला पश्चिम बंगाल 2 महीने पहले 51
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला टीएमसी के बागी सांसदों के मामले में किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले दोनों पक्षों की बात सुनेंगे। फैसला कानूनी राय के आधार पर मानसून सत्र से पहले लिए जाने की संभावना है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों से जुड़े विवाद में कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेंगे। वे दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही इस मामले में आगे बढ़ेंगे। इसी कड़ी में स्पीकर कार्यालय की ओर से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी सांसदों के समूह को ईमेल भेजकर बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है।

ममता खेमे के सांसदों से बातचीत के बाद होगा निर्णय

सूत्रों का कहना है कि इस मुलाकात के बाद ही स्पीकर बागी गुट से संबंधित कोई फैसला सुनाएंगे। उल्लेखनीय है कि सूत्रों के अनुसार टीएमसी के बागी खेमे के 20 सांसदों ने पहले अध्यक्ष से भेंट की थी और एक पत्र सौंपकर अपने समूह का एनसीपीआई में विलय किए जाने की मांग रखी थी।

ममता गुट से भी मांगा गया जवाब

सूत्रों के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को भी ईमेल भेजकर इस प्रकरण पर उसका रुख जानना चाहा है। इससे पूर्व संसद से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिया था कि अलग हुए सांसदों की 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) नामक अपेक्षाकृत कम चर्चित दल में विलय के बाद उन्हें एक स्वतंत्र समूह के रूप में मान्यता देने की मांग पर अध्यक्ष कानूनी सलाह ले सकते हैं।

मानसून सत्र से पहले आ सकता है फैसला

सूत्रों ने बताया कि इस मांग को लेकर कोई भी निर्णय संसद के मानसून सत्र से पहले लिया जाएगा, जो सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में आरंभ होता है। उनके अनुसार अलग हुए गुट को मान्यता दी जाए या नहीं, यह तय करने में केंद्रीय विधि मंत्रालय की लिखित राय आधार बनेगी।

कानूनी राय लेगा विधि मंत्रालय

बताया गया है कि मंत्रालय किसी वरिष्ठ कानूनी अधिकारी से परामर्श करने के बाद ही अपनी राय देगा। सूत्रों का कहना है कि यह कानूनी सलाह इसलिए ली जा रही है ताकि अध्यक्ष का निर्णय अगर अदालत में चुनौती दिए जाने की स्थिति में न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर टिक सके। लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचारी ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 का उल्लेख करते हुए कहा कि विलय केवल एक राजनीतिक दल का दूसरे राजनीतिक दल में हो सकता है, अलग-अलग सांसद या विधायक इसके पात्र नहीं हैं।

संविधान विशेषज्ञ की राय

आचारी ने समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा, 'अगर किसी राजनीतिक दल का नेतृत्व किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय लेता है, तो उसके सांसदों और विधायकों को उस विलय को स्वीकार करना होता है। लेकिन सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी अन्य दल में विलय नहीं कर सकते। यही संवैधानिक व्यवस्था है।'

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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