नागपुर से मंगवाए टिश्यू कल्चर सागवान, 2 साल में ही 30 फीट ऊंचे हुए पेड़, ऐसे होगी लाखों की कमाई झारखंड एक महीने पहले 76
झारखंड के पलामू जिले के एक प्रगतिशील किसान ने पारंपरिक खेती से हटकर टिश्यू कल्चर तकनीक से सागवान उगाकर सफलता की नई कहानी लिखी है। महज 2 साल में उनके पेड़ 30 फीट तक बढ़ गए हैं और आने वाले वर्षों में यह लाखों का मुनाफा देने की राह पर हैं।

खेती में नया बदलाव

आज के दौर में किसान पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर अब इमारती लकड़ियों की खेती में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इसमें सागवान यानी टीक की खेती एक बेहद मुनाफे वाला विकल्प बनकर उभरी है। कम लागत और लंबे समय तक बेहतरीन रिटर्न के कारण यह किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है। इसी क्रम में पलामू जिले के रहने वाले व्यवसायी और प्रकृति प्रेमी सतीश दुबे ने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। उन्होंने टिश्यू कल्चर तकनीक का इस्तेमाल कर सागवान के पौधों को उगाया है, जिसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले हैं।

टिश्यू कल्चर तकनीक का कमाल

सतीश दुबे ने पलामू स्थित अपने 4 एकड़ के खेत को एक आदर्श बागान का रूप दिया है। उन्होंने नागपुर से विशेष रूप से टिश्यू कल्चर सागवान के करीब 500 पौधे मंगवाकर अपने बगीचे में रोपे हैं। टिश्यू कल्चर पद्धति से तैयार पौधों की सबसे बड़ी खूबी उनकी तेजी से बढ़ने की क्षमता है। सतीश दुबे का कहना है कि इन पौधों को रोपे हुए अभी मात्र 2 वर्ष का समय बीता है, लेकिन इनकी ऊंचाई पहले से ही 25 से 30 फीट के बीच पहुंच चुकी है। सामान्य सागवान की तुलना में यह वृद्धि दर काफी प्रभावशाली है और इन पौधों की लकड़ी की गुणवत्ता भी काफी उच्च श्रेणी की होती है।

मुनाफे का गणित

सतीश दुबे ने बताया कि भविष्य को ध्यान में रखकर उन्होंने यह निवेश किया है। उनका अनुमान है कि यदि इन सागवान के पेड़ों को लगभग 15 वर्षों तक सही ढंग से सुरक्षित रखा जाए, तो एक पेड़ से उन्हें करीब 1 लाख रुपये तक का मुनाफा प्राप्त हो सकता है। बाजार में इमारती लकड़ी की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी कीमतों में भविष्य में और उछाल आने की पूरी संभावना है। यह खेती उन किसानों के लिए एक बहुत अच्छा दीर्घकालिक निवेश साबित हो सकती है, जो अपनी जमीन का बेहतर इस्तेमाल करना चाहते हैं।

शुरुआती देखभाल और मेहनत

सतीश दुबे ने साझा किया कि इस खेती में सफलता का मंत्र शुरुआती मेहनत और सही पोषण है। जब उन्होंने इन 500 पौधों को रोपा था, तब हर एक गड्ढे में 10 से 15 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद के साथ जैविक सामग्री का उपयोग किया गया था। उन्होंने बताया कि पौधों को रोपण के बाद शुरुआती दो से तीन साल तक नियमित रूप से सिंचाई, देखभाल और खरपतवार की सफाई पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। एक बार जब पौधे एक निश्चित ऊंचाई और मजबूती प्राप्त कर लेते हैं, तो फिर उन्हें विशेष देखरेख की आवश्यकता नहीं पड़ती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न के बराबर होता है, जिससे लागत काफी कम बनी रहती है।

किसानों के लिए एक सफल मॉडल

सतीश दुबे का यह चार एकड़ का बागान केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि उन किसानों के लिए एक मॉडल है जिनके पास अतिरिक्त खाली जमीन पड़ी है। वे मानते हैं कि इमारती पौधों की खेती न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि यह किसानों को आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करती है। टिश्यू कल्चर सागवान जैसी आधुनिक किस्मों का चयन करके किसान कम समय में अधिक लाभ कमा सकते हैं। सतीश दुबे की यह पहल साबित करती है कि अगर सही योजना और धैर्य का सहारा लिया जाए, तो इमारती वृक्षों की खेती से आने वाले समय में लाखों की कमाई करना कोई मुश्किल काम नहीं है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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