छत्तीसगढ़
2 घंटे पहले
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त्योहार के सीजन में पारंपरिक मिठास की बढ़ती मांग
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में इन दिनों जितिया पर्व की धूम देखने को मिल रही है। इस पावन अवसर पर जहां लोग पूजा-पाठ और नियमों का पालन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक पकवानों की मांग भी सातवें आसमान पर पहुंच गई है। विशेष रूप से इस त्योहार के दौरान बनाए जाने वाले पकवान गुजिया की मांग बाजार में काफी ज्यादा बढ़ जाती है। सरगुजा जिले में एक ऐसा परिवार भी है जो पिछले 20 से 25 सालों से लगातार जितिया के इस पावन सीजन में गुजिया बनाने का काम कर रहा है। यह परिवार न केवल अपनी परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि त्योहारों के इस खास मौके पर इसके जरिए बेहतरीन कमाई भी कर लेता है।
घर पर तैयार होती है शुद्ध और देशी स्वाद वाली गुजिया
इस परिवार की सबसे खास बात यह है कि ये लोग किसी आधुनिक मशीन का उपयोग करने के बजाय अपने घर पर ही पूरी तरह से देशी और पारंपरिक अंदाज में गुजिया तैयार करते हैं। इनके हाथों से बनी इस गुजिया की शुद्धता और लाजवाब स्वाद के कारण ही इसकी मांग शहर के बड़े-बड़े थोक व्यापारियों यानी होलसेलरों के बीच भी बहुत ज्यादा है। बड़े पैमाने पर तैयार की जाने वाली इस गुजिया की आपूर्ति स्थानीय बाजारों के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी की जाती है।
जानिए कैसे तैयार होता है यह स्वादिष्ट पकवान
गुजिया बनाने की पारंपरिक और बारीकी से भरी प्रक्रिया के बारे में बताते हुए परिवार के सदस्य यश गुप्ता ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि इस स्वादिष्ट पकवान को तैयार करने की शुरुआत पानी को अच्छी तरह से गर्म करने के साथ होती है। इसके बाद मुख्य सामग्री के रूप में मैदा लिया जाता है। मैदा में शुद्ध डालडा और अन्य जरूरी सामग्रियां मिलाई जाती हैं, जिससे गुजिया का बाहरी हिस्सा खस्ता और स्वादिष्ट बन सके।
इसके बाद इस पूरे मिश्रण को पानी की मदद से अच्छी तरह से गूंथा जाता है। जब मैदा पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसकी छोटी-छोटी लोइयां बनाई जाती हैं। इन लोइयों को गोल आकार में बेला जाता है। इसके बाद इन बेली हुई पूरियों के बीच में खोवे की खास फिलिंग भरी जाती है और इसे गुजिया का पारंपरिक और खूबसूरत आकार दिया जाता है।
ग्राहकों की पसंद का रखा जाता है पूरा ध्यान
यश गुप्ता के अनुसार, गुजिया का असली स्वाद उसके अंदर भरे जाने वाले मिश्रण यानी फिलिंग पर निर्भर करता है। इस पारंपरिक गुजिया की फिलिंग में मुख्य रूप से शुद्ध खोवे का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, ग्राहकों की पसंद और उनकी मांग को ध्यान में रखते हुए इस फिलिंग में बदलाव भी किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि:
- यदि कोई ग्राहक गुजिया के अंदर काजू या अन्य सूखे मेवे पसंद करता है, तो उसमें काजू भी भरपूर मात्रा में मिलाया जाता है।
- गुजिया के अंदर कौन-कौन सी सामग्री डाली जानी है और उसका स्वाद कैसा होना चाहिए, यह पूरी तरह से ग्राहकों की व्यक्तिगत पसंद और उनके ऑर्डर पर निर्भर करता है।
तैयारी में लगने वाला समय और मेहनत
गुजिया तैयार करने में लगने वाले समय के बारे में बात करते हुए यश गुप्ता ने बताया कि यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी मात्रा में गुजिया बनाई जा रही है। अगर कम मात्रा में गुजिया बनानी हो, तो यह काम करीब एक घंटे में आसानी से पूरा हो जाता है। लेकिन जब थोक के ऑर्डर्स आते हैं और बहुत ज्यादा मात्रा में गुजिया बनानी होती है, तो इस काम को पूरा करने में पूरा का पूरा दिन भी लग जाता है। पूरे परिवार के सदस्य मिलकर इस मेहनत भरे काम को पूरा करते हैं।
तीज और जितिया के त्योहारों में सबसे ज्यादा मांग
यश गुप्ता का कहना है कि साल भर में गुजिया की सबसे ज्यादा मांग विशेष रूप से तीज और जितिया के त्योहारों के दौरान ही देखी जाती है। जितिया के पावन पर्व पर इस पकवान का बहुत अधिक धार्मिक महत्व भी है, क्योंकि इसे पूजा के दौरान मुख्य प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है। इसी अत्यधिक मांग को पूरा करने के लिए परिवार त्योहार के शुरू होने से करीब 5 से 10 दिन पहले से ही दिन-रात गुजिया बनाने की तैयारियों में जुट जाता है, ताकि समय पर हर ग्राहक को ताजा और स्वादिष्ट गुजिया मिल सके।
दो दशकों से अधिक का विश्वास और सीजनल कमाई
यह काम इस परिवार के लिए केवल एक व्यवसाय नहीं बल्कि एक पुरानी परंपरा बन चुका है। यश गुप्ता पिछले करीब 20 से 25 साल से लगातार इस काम को करते आ रहे हैं। उन्होंने ग्राहकों के साथ अपने गहरे विश्वास के बारे में बताते हुए कहा कि वे व्यवसाय में पूरी ईमानदारी बरतते हैं। उनके यहां सबसे पहले ग्राहकों को गुजिया चखाई जाती है और जब ग्राहक को स्वाद पूरी तरह से पसंद आ जाता है, उसके बाद ही उसकी बिक्री की जाती है।
इस पूरे त्योहारी सीजन के दौरान कड़ी मेहनत और बिक्री करने के बाद यह परिवार आसानी से करीब 20 हजार रुपये तक की अच्छी-खासी कमाई कर लेता है। यह कमाई त्योहार के समय परिवार की खुशियों को दोगुना कर देती है और उनकी इस पारंपरिक कला को भी जिंदा रखती है।
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