अंबिकापुर: जंगलों के कटने और जहरीले रसायनों की मार, गांवों से गायब हो रहे हैं कौवे छत्तीसगढ़ 2 घंटे पहले 6
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कौवों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं। विशेषज्ञ पेड़ों की कटाई और खेती में कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग को इसका बड़ा कारण मान रहे हैं।

अंबिकापुर में कौवों का अकाल

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। यहां के स्थानीय क्षेत्रों में कभी बहुतायत में दिखने वाले कौवे अब बहुत कम नजर आ रहे हैं। एक समय था जब गांव हो या शहर का बाहरी इलाका, कौवों की चहचहाहट और उनकी उपस्थिति हर जगह देखी जा सकती थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। पितृ पक्ष जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर भी कौवों की अनुपस्थिति स्थानीय लोगों के लिए गहरी चिंता का विषय बनी हुई है।

पर्यावरण में हो रहे बदलाव का असर

स्थानीय निवासी सलीमा मिंज ने इस समस्या पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, कौवों की घटती संख्या मात्र एक संयोग नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण में आ रहे नकारात्मक बदलावों का स्पष्ट संकेत है। सलीमा मिंज का कहना है कि पहले गांवों और उसके आसपास के क्षेत्रों में घने पेड़-पौधे हुआ करते थे, जो इन पक्षियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक आवास का काम करते थे। अब तेजी से हो रही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने इन पक्षियों के रहने और भोजन तलाशने के ठिकानों को खत्म कर दिया है।

कीटनाशकों का बढ़ता खतरा

कौवों की आबादी में कमी आने का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण खेती के तरीके में बदलाव है। सब्जियों और अन्य फसलों की पैदावार को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए रसायनों और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। सलीमा मिंज ने इस पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि खेतों में उपयोग किए जाने वाले ये हानिकारक रसायन अंततः खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन रहे हैं और पक्षियों तक पहुंच रहे हैं। इन रसायनों का सीधा दुष्प्रभाव कौवों की प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है, जिसके कारण उनकी नई पीढ़ी का पनपना मुश्किल हो गया है।

बचाव के लिए क्या हैं उपाय

पक्षियों की इस प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने के लिए अब स्थानीय स्तर पर जागरूकता की मांग उठने लगी है। सलीमा मिंज ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं जो कौवों की वापसी में सहायक हो सकते हैं:

  • वृक्षारोपण को बढ़ावा: पक्षियों को फिर से अपना प्राकृतिक बसेरा मिले, इसके लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाना अनिवार्य है।
  • जैविक खेती का महत्व: खेती में रसायनों और जहरीले कीटनाशकों का त्याग कर जैविक तरीकों को अपनाना होगा, ताकि पर्यावरण शुद्ध रह सके।
  • पर्यावरण संरक्षण: पक्षियों के लिए घरों की छतों या खुले स्थानों पर दाना और पानी की नियमित व्यवस्था करना उनकी मौजूदगी बनाए रखने के लिए एक छोटा लेकिन प्रभावी कदम हो सकता है।

कुल मिलाकर, यदि समय रहते पेड़ों की कटाई और रसायनों के उपयोग पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में हमें अपने आसपास से कौवों जैसी आम दिखने वाली चिड़ियों को भी पूरी तरह खोना पड़ सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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