पितृ पक्ष में गायब हो रहे कौवे: अंबिकापुर में पक्षियों की घटती आबादी से बढ़ी चिंता, जानिए इसके बड़े कारण छत्तीसगढ़ 3 घंटे पहले 6
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कौवों की संख्या में आई भारी कमी से लोग चिंतित हैं। पितृ पक्ष के दौरान कौवों के दर्शन दुर्लभ होने के पीछे पर्यावरण में आए बदलाव और मानवीय हस्तक्षेप को मुख्य जिम्मेदार माना जा रहा है।

पितृ पक्ष में कौवों की कमी से गहराया संकट

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के मुख्यालय अंबिकापुर में एक अजीब और चिंताजनक स्थिति देखने को मिल रही है। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष के दौरान कौवों का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन अब इस शहर में कौवे गिनती भर के रह गए हैं। पितृ पक्ष के समय कौवों का दिखाई न देना स्थानीय निवासियों के बीच चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है। लोग अब इस बात को लेकर हैरान हैं कि आखिर उनके आसपास की हरियाली और पेड़ों पर चहकने वाले ये पक्षी अचानक कहां गायब हो गए हैं।

पर्यावरण में बदलाव और घटती संख्या

स्थानीय निवासी सलीमा मिंज ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि कुछ साल पहले तक गांव और शहरी इलाकों के आसपास कौवे बड़ी संख्या में दिखाई देते थे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कौवों की घटती आबादी को उन्होंने पर्यावरण में हो रहे विनाशकारी बदलावों का सीधा संकेत बताया है। सलीमा के अनुसार, यह केवल एक पक्षी के कम होने की बात नहीं है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र में आ रहे असंतुलन का एक बड़ा प्रमाण है।

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई बनी मुख्य वजह

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि कौवों की संख्या में आई इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण पेड़ों की लगातार होती कटाई है। पहले अंबिकापुर के आसपास घने पेड़ और छोटे जंगल हुआ करते थे, जो पक्षियों के लिए एक सुरक्षित प्राकृतिक आवास प्रदान करते थे। अंधाधुंध निर्माण कार्यों और विकास के नाम पर हुई पेड़ों की कटाई ने इन पक्षियों से उनका घर और भोजन तलाशने का ठिकाना छीन लिया है। पेड़ों के बिना कौवे और अन्य पक्षी अब वहां रहने को मजबूर नहीं हैं।

कीटनाशकों का जहरीला असर

कौवों की आबादी कम होने का एक और गंभीर कारण खेती और सब्जियों की पैदावार में होने वाला रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल है। सलीमा मिंज का दावा है कि इन हानिकारक रसायनों का प्रभाव सीधे तौर पर पक्षियों के प्रजनन चक्र पर पड़ रहा है। कीटनाशकों के प्रयोग से न केवल मिट्टी और जल प्रदूषित हो रहे हैं, बल्कि इनका असर खाद्य श्रृंखला के जरिए पक्षियों तक पहुंच रहा है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ा है और आने वाली पीढ़ियां कम हो गई हैं।

संरक्षण के लिए जरूरी है बदलाव

कौवों और अन्य विलुप्त हो रहे पक्षियों को बचाने के लिए अब तत्काल कदम उठाने की अपील की जा रही है। पर्यावरणविदों और निवासियों का कहना है कि अगर हमें पक्षियों की आबादी वापस लानी है, तो हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे। इसके साथ ही, खेती में जैविक तरीकों को प्राथमिकता देने और रासायनिक कीटनाशकों के बजाय सुरक्षित विकल्पों को अपनाने की जरूरत है। पक्षियों के लिए नियमित रूप से दाना और पानी की व्यवस्था करना भी उन्हें दोबारा शहरी और ग्रामीण इलाकों में वापस बुलाने में सहायक साबित हो सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप