भारत
एक घंटा पहले
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विचारों
नीट पेपर लीक मामले को लेकर देश भर में मचे बवाल और विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा और उसके बाद हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर आदेश जारी करते हुए कहा है कि उन तमाम छात्रों को तुरंत पुलिस हिरासत और गिरफ्तारी से मुक्त किया जाए, जिनका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है।
छात्रों को तत्काल राहत और सात राज्यों को नोटिस
सर्वोच्च अदालत ने नीट प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई पुलिस कार्रवाई के मामले में हस्तक्षेप करते हुए बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि प्रदर्शन के दौरान पकड़े गए ऐसे छात्र, जिनके खिलाफ पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, उन्हें बिना किसी देरी के तुरंत छोड़ दिया जाए। इसके साथ ही, कोर्ट ने उन छात्रों के खिलाफ भी आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की बात कही है जिनके खिलाफ केवल इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ही मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश के सात राज्यों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया है। इन राज्यों में शामिल हैं:
- दिल्ली
- बिहार
- महाराष्ट्र
- असम
- पश्चिम बंगाल
- उत्तर प्रदेश
- केरल
अदालत ने इन सभी राज्यों को नोटिस का जवाब देने के साथ-साथ प्रदर्शन से जुड़े सभी इलाकों के सीसीटीवी फुटेज को पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित रखने का कड़ा आदेश दिया है ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके।
प्रदर्शन में हुई हिंसा पर CJI की गंभीर चिंताएं
सुनवाई के दौरान CJI ने याचिकाओं में लगाए गए गंभीर आरोपों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में घायल हुए लोगों की स्थिति का जिक्र करते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए। CJI ने अपनी टिप्पणी में कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से जो शिकायतें आई हैं, वे काफी गंभीर हैं:
- एक घटना में पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण 19 वर्ष के एक निर्दोष युवक ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी।
- प्रदर्शन के दौरान बिजली के डंडों (इलेक्ट्रिक बैटन) का इस्तेमाल भी किया गया, जो बेहद चिंताजनक है।
- पुलिस कार्रवाई में गंभीर रूप से घायल हुई एक युवा महिला को गंभीर हालत में अस्पताल के ICU में भर्ती कराना पड़ा।
- आरोप हैं कि कीलों से लैस लाठियों से छात्रों पर वार किए गए, जिससे कई लोगों को जानलेवा चोटें आईं।
- मीडियाकर्मियों को भी निशाना बनाया गया। एक मीडिया कर्मी पर हुए बर्बर हमले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने चिंता जताई।
- सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा भी कथित तौर पर हिंसा करने की बातें सामने आई हैं।
- एक अन्य घटना में, बिना किसी उकसावे के एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक युवा महिला को थप्पड़ मारे जाने का भी गंभीर आरोप लगाया गया है।
इन तमाम मामलों को देखते हुए, अदालत में पुलिस की अत्यधिक और अनियंत्रित कार्रवाई के खिलाफ एक नई और अलग याचिका भी दायर की गई है।
एक स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की दरकार
अदालत ने दोटूक शब्दों में कहा कि कानून की नजर में कोई भी ऊपर नहीं है। CJI ने स्पष्ट किया कि जिसने भी अपनी कानूनी सीमाओं को लांघा है और निर्दोष प्रदर्शनकारियों पर जुल्म ढाए हैं, उसके खिलाफ कानून के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि, इसके लिए एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में किसी की जवाबदेही ही तय नहीं की जाएगी, तो ऐसी किसी भी कानूनी प्रक्रिया का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। इस मामले की तह तक जाने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए, जिसके स्वरूप और सदस्यों के बारे में न्यायालय बाद में फैसला करेगा।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने पुलिसकर्मियों का पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि इस हिंसा में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि पुलिस वाले भी शिकार हुए हैं। तुषार मेहता के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान लगभग 250 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनमें से कई पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आई हैं और उन्हें टांके लगाने पड़े हैं। उन्होंने तर्क दिया कि वास्तविक छात्र इस तरह की हिंसक वारदातों को अंजाम नहीं दे सकते। निश्चित रूप से कुछ असामाजिक तत्व और बिन बुलाए मेहमान इस भीड़ में शामिल हो गए थे। सरकार के पास इस बात के पुख्ता आंकड़े मौजूद हैं कि वहां हत्या, बलात्कार और NDPS के आरोपों से घिरे लोग भी मौजूद थे। इसलिए, इस पूरे मामले की एक निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच सबके सामने आ सके।
इस पर CJI ने जवाब दिया कि तमाम कोशिशों के बावजूद, अदालत के लिए हर एक तथ्य की गहराइयों में जाकर जमीनी जांच करना संभव नहीं है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए प्रथम दृष्टया यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि एक स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों ने भी अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। जाने-माने अधिवक्ता मैथ्यूज नेदुमपरा ने सुप्रीम कोर्ट के इस व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण की सराहना की। उन्होंने कहा कि वह इस हिंसा में घायल हुए लोगों के प्रति पूरी सहानुभूति रखते हैं, लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं की भी अपनी एक सीमा होती है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने जोर देकर कहा कि अदालत द्वारा सबूतों और घटना से जुड़ी सामग्रियों को सुरक्षित रखने का जो अंतरिम आदेश पहले दिया गया था, उसे आगे भी पूरी मुस्तैदी से जारी रखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत के समक्ष कई तरह के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए यह दलील दी कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा छात्रों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का हनन किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिलने वाले मौलिक अधिकारों को ताक पर रखकर छात्रों पर बल का बर्बर और अनुचित प्रयोग किया है।
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