राष्ट्रीय राजनीति
5 घंटे पहले
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आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में पिछले करीब छह साल से सलाखों के पीछे बंद एक व्यक्ति के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से राहत की बड़ी खबर आई है। NIA द्वारा दर्ज मुकदमे के तहत जेल में बंद इस आरोपी की गंभीर पारिवारिक मजबूरियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे 10 दिनों की अंतरिम जमानत दे दी है। अदालत ने मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए आरोपी को अपने परिवार के साथ कुछ समय बिताने की अनुमति दी है।
पारिवारिक मजबूरियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को 11 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक के लिए जेल से बाहर रहने की मंजूरी दी है। अदालत के आदेश के अनुसार, आरोपी को अंतरिम जमानत की यह अवधि समाप्त होने पर 21 सितंबर की शाम 5 बजे तक जेल प्रशासन के समक्ष हर हाल में आत्मसरपर्ण करना होगा। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी की अंतरिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुनाया। पीठ ने साफ किया कि संबंधित निचली अदालत द्वारा तय की जाने वाली शर्तों के आधार पर ही आरोपी को रिहा किया जाएगा। इसके साथ ही, कोर्ट ने जांच एजेंसी को यह अधिकार भी दिया है कि वह चाहे तो अपने खर्च पर आरोपी की सुरक्षा या निगरानी के लिए पुलिस एस्कॉर्ट की व्यवस्था कर सकती है।
जमानत मिलने के मुख्य कारण
इस मामले में आरोपी के वकील द्वारा अदालत के समक्ष जो पारिवारिक परिस्थितियां रखी गईं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर माना। कोर्ट ने निम्नलिखित कारणों के आधार पर आरोपी को राहत प्रदान की:
- आरोपी का नाबालिग बच्चा लंबे समय से सुनने की गंभीर बीमारी (दिव्यांगता) से पीड़ित है और हाल ही में उसकी बाइलेटरल कॉक्लियर इम्प्लांटेशन सर्जरी (दोनों कानों में मशीन लगाने का ऑपरेशन) हुई है।
- आरोपी की मां का स्वास्थ्य बेहद खराब है और उन्हें इस नाजुक समय में बेटे की जरूरत है।
- आरोपी के भाई की भी आंखों का ऑपरेशन होने की संभावना है।
- आरोपी पिछले 5 साल और 11 महीने से लगातार जेल में बंद है और इस लंबी हिरासत को देखते हुए उसका बाहर आना जरूरी माना गया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने किया था जमानत का विरोध
सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने आरोपी को अंतरिम जमानत दिए जाने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि आरोपी के बच्चे की सुनने की समस्या बहुत पुरानी है और यह लंबे समय से चली आ रही है, इसलिए इसके लिए तत्काल किसी विशेष राहत की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी दलील दी कि आरोपी की मां को फिलहाल किसी आपातकालीन चिकित्सा उपचार की आवश्यकता नहीं है और उसका भाई उसी घर में नहीं रहता है। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने अभियोजन पक्ष के इन तर्कों को दरकिनार करते हुए मानवीय आधार पर आरोपी को 10 दिनों की राहत प्रदान करना ही उचित समझा।
प्रतिबंधित संगठन और जांच की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला प्रतिबंधित वैश्विक आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों से संबंधित है। NIA ने बेंगलुरु में इस आतंकी संगठन के समर्थकों की संदिग्ध गतिविधियों की जांच के बाद सितंबर 2020 में एक आपराधिक मामला दर्ज किया था। इस मामले में IPC की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) और धारा 125 (एशियाई शक्तियों के खिलाफ युद्ध छेड़ना) के साथ-साथ UAPA की धारा 17, 18 और 18बी जैसी गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
इसके बाद, जांच एजेंसी ने कार्रवाई करते हुए 7 अक्टूबर 2020 को आरोपी को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के दौरान उसके घर की गहन तलाशी ली गई थी, जिसमें एक डायरी और कई अन्य आपत्तिजनक डिजिटल व भौतिक दस्तावेज जब्त किए जाने का दावा किया गया था। इन सबूतों के आधार पर NIA ने बाद में आरोपी और उसके साथियों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।
कर्नाटक हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत
सुप्रीम कोर्ट का रुख करने से पहले आरोपी ने अपनी नियमित जमानत के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, इसी साल 29 जनवरी को कर्नाटक हाईकोर्ट ने उसकी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के समक्ष आरोपी ने दलील दी थी कि उसके मुकदमे की सुनवाई में काफी देरी हो रही है, उसकी गिरफ्तारी के लिखित कारण उसे नहीं दिए गए थे और उसकी खुद की सेहत भी ठीक नहीं है।
लेकिन हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा था कि इस मामले के कुल 60 गवाहों में से अब तक केवल 19 गवाहों से ही पूछताछ पूरी हो सकी है। हाईकोर्ट ने निचली विशेष अदालत को इस मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर की, जिस पर सर्वोच्च अदालत ने 20 मार्च को नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। अब इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार आरोपी को 10 दिनों की इस अल्पकालिक अंतरिम राहत की मंजूरी दे दी है।
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