ससुराल का मिला साथ तो बदल गई लाल परी की दुनिया, आज कृषि सखी बनकर सैकड़ों किसानों को सिखा रही हैं जैविक खेती के गुर व्यापार 2 महीने पहले 77
श्रावस्ती के एक छोटे से गांव से बहराइच की बहू बनी लाल परी ने अपनी मेहनत और परिवार के सहयोग से मिसाल कायम की है। आज वे कृषि सखी के रूप में अन्य किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रेरित कर रही हैं।

सपनों को मिली परिवार की उड़ान

कहावत है कि अगर घर के बड़े बुजुर्गों और जीवनसाथी का साथ मिल जाए, तो कोई भी महिला सफलता की बुलंदियों को छू सकती है। बहराइच जिले की रहने वाली लाल परी ने इस बात को अपने जीवन में सच कर दिखाया है। एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली यह महिला आज न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि इलाके के सैकड़ों किसानों का मार्गदर्शन भी कर रही हैं। वे आज एक सफल कृषि सखी के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं और दूसरों को भी खेती की नई तकनीकें सिखा रही हैं।

श्रावस्ती से बहराइच तक का सफर

लाल परी का जन्म श्रावस्ती जिले के एक साधारण से ग्रामीण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा गांव के ही स्कूल से पूरी की और इंटर तक की पढ़ाई की। ग्रामीण परिवेश के कारण उनकी शादी जल्दी ही तय कर दी गई। शादी के बाद वे बहराइच जिले के महसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मिर्जापुर गांव में बहू बनकर आ गईं। सामान्य तौर पर गांव की लड़कियां शादी के बाद घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों में सिमट जाती हैं, लेकिन लाल परी के मन में कुछ अलग करने की इच्छाशक्ति हमेशा जीवित रही। उन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के साथ ही अपने सपनों को भी जीवित रखा और आगे बढ़ने की योजना बनाती रहीं।

कृषि विभाग के साथ नई शुरुआत

किसान परिवार में आने के कारण लाल परी ने सोचा कि क्यों न वे कृषि क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों में खुद को आगे बढ़ाएं। इसी विचार के साथ उन्होंने जैविक खाद बनाने की ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। उनकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे उनके लिए सफलता के रास्ते खुलते गए। बाद में उनका चयन कृषि विभाग के अंतर्गत आने वाले कृषि सखी पद के लिए हो गया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने बतौर कृषि सखी (CRP) अपने काम की शुरुआत की। कृषि सखी कृषि विभाग का एक महत्वपूर्ण पद है, जो विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए तैयार किया गया है।

जैविक खेती का प्रसार

लाल परी ने कृषि सखी के रूप में काम करते हुए अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी खेती से जुड़ी आधुनिक और टिकाऊ विधियों से जोड़ा है। उनके प्रशिक्षण का मुख्य जोर जैविक खेती पर है। अब तक उन्होंने लगभग 125 किसानों को पूरी तरह से जैविक खाद तैयार करना सिखा दिया है। उनके द्वारा प्रशिक्षित किसान अब रसायनों और हानिकारक खाद का इस्तेमाल छोड़कर पूरी तरह से जैविक पद्धति की ओर रुख कर रहे हैं। वे गाय के गोबर, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक चीजों का उपयोग करके ब्रह्मास्त्र और वर्मी कंपोस्ट जैसे प्रभावी खाद बना रहे हैं, जिससे उनकी खेती की लागत भी कम हो रही है और पैदावार भी बेहतर हो रही है।

पति और सास-ससुर का सहयोग

अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय लाल परी अपने ससुराल वालों को देती हैं। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यह धारणा होती है कि बहू का काम केवल घर के चूल्हा-चौका तक सीमित रहना चाहिए, लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने अपने सास-ससुर और पति के साथ इस बारे में खुलकर बात की और अपनी महत्वाकांक्षाओं के बारे में बताया। उनके परिवार ने उनकी समझदारी को सराहा और उन्हें पूरा सहयोग दिया। इसी सकारात्मक वातावरण के कारण वे घर से बाहर निकलकर कृषि सखी की भूमिका निभा पा रही हैं। लाल परी का मानना है कि यदि ससुराल से सही सपोर्ट मिले, तो कोई भी बहू समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर सकती है।

राजीव खन्ना पाबना के व्यापार संवाददाता हैं और कंपनियों, बाजार तथा अर्थव्यवस्था की खबरों को सरल भाषा में समझाते हैं। कारोबार जगत के बड़े फैसलों, नीतिगत बदलावों और उनके आम आदमी पर असर को वे गहराई से कवर करते हैं। उनका मकसद जटिल आर्थिक खबरों को हर पाठक के लिए आसान बनाना है।

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