इंजीनियरिंग छोड़ अपनाया केमिकल-फ्री खेती का रास्ता: पिता की मौत के बाद जहानाबाद के मनीष कुमार ने खड़ा किया लाखों का स्टार्टअप, मिल रही सरकारी मदद व्यापार 4 घंटे पहले 2
पिता के निधन के बाद बिहार के मनीष कुमार ने जैविक और पारंपरिक खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक सफल स्टार्टअप की शुरुआत की, जिसे केंद्र और राज्य सरकार से आर्थिक सहयोग मिल रहा है।

आज के दौर में हर युवा एक सुरक्षित और बेहतर भविष्य की तलाश में रहता है। कोई बड़ी कंपनी में नौकरी पाकर अपने जीवन को संवारना चाहता है, तो कोई खुद का व्यवसाय शुरू कर दूसरों को रोजगार देना चाहता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी सोच सिर्फ अपने और अपने परिवार के विकास तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि वे समाज और पूरे देश के कल्याण के लिए काम करना चाहते हैं। बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले मनीष कुमार भी एक ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। मनीष ने पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक बेहतरीन स्टार्टअप की नींव रखी है, जिसने न केवल उनकी अपनी जिंदगी बदली है, बल्कि क्षेत्र के कई लोगों को विकास की एक नई राह दिखाई है।

पिता के निधन से मिली जीवन को नई दिशा

मनीष कुमार का शुरुआती सफर कृषि क्षेत्र से नहीं जुड़ा था। वह इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं और तकनीक की दुनिया में अपना भविष्य तलाश रहे थे। पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में यह विचार आने लगा था कि हमें रसायन-मुक्त और प्राकृतिक खेती की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। इसी दौरान वे एक ऐसी जगह पर गए जहां देसी गाय के दूध और घी को लेकर पारंपरिक तरीके से काम किया जा रहा था। इस अनुभव ने उन्हें काफी प्रभावित किया। इसी बीच एक बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी ने उनके जीवन का रुख पूरी तरह से बदल दिया। मनीष के पिता का मधुमेह यानी डायबिटीज की बीमारी के कारण निधन हो गया।

पिता की मृत्यु के बाद मनीष के मन में कई गहरे सवाल उठने लगे। वे अक्सर सोचते थे कि उनके पिता हमेशा पोषक तत्वों से भरपूर और अच्छा भोजन करते थे, फिर भी उन्हें यह गंभीर बीमारी कैसे हो गई? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मनीष इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमारे समाज में बीमारियों की सबसे बड़ी जड़ हमारा गलत खान-पान और भोजन उत्पादन के आधुनिक, केमिकल-युक्त तरीके हैं। इसके बाद उन्होंने अपने पूर्वजों के खान-पान की शैली और उनकी लंबी उम्र के कारणों पर शोध किया। उन्होंने महसूस किया कि अगर पुरानी पारंपरिक खाद्य प्रणाली को दोबारा अपनाया जाए, तो समाज को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है। यहीं से मनीष के एक नए सफर की शुरुआत हुई।

ताड़ और खजूर से बना रहे हैं अनोखे उत्पाद

मनीष कुमार ने अपने स्टार्टअप के तहत पारंपरिक और रसायन-मुक्त उत्पादों को तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया। आज वे बाजार में कई प्रकार के सेहतमंद उत्पाद उपलब्ध करा रहे हैं। मनीष मुख्य रूप से निम्नलिखित पारंपरिक उत्पादों का निर्माण और बिक्री कर रहे हैं:

  • खजूर और ताड़ का गुड़: सफेद चीनी के एक बेहतरीन और स्वस्थ विकल्प के रूप में इसे तैयार किया जाता है।
  • देसी खांड: बिना किसी केमिकल के पारंपरिक तरीके से बनाई जाने वाली खांड जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है।
  • ताल मिश्री: गले की खराश और कफ जैसी समस्याओं में लाभकारी पारंपरिक मिश्री।
  • कालानमक चावल: अपनी खास खुशबू और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध चावल की पारंपरिक किस्म।
  • रसायन-मुक्त गेहूं: बिना किसी हानिकारक खाद या कीटनाशक के उगाया गया गेहूं।

इन सभी उत्पादों को तैयार करने के लिए मनीष स्थानीय स्तर पर ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों की मदद लेते हैं। इस तरह वे स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा कर रहे हैं। इन उत्पादों की बिक्री के लिए उन्होंने अपना खुद का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया है।

सरकारी सहयोग से मिला स्टार्टअप को बढ़ावा

मनीष कुमार द्वारा शुरू किया गया यह अनोखा स्टार्टअप आज केंद्र सरकार और बिहार सरकार दोनों के पास पंजीकृत है। उनके इस अनूठे प्रयास को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से भी बड़ी आर्थिक मदद दी गई है। मनीष के स्टार्टअप को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की गई है, जबकि बिहार राज्य सरकार की तरफ से उन्हें 10 लाख रुपये का अनुदान यानी सब्सिडी मिली है।

इस बड़ी वित्तीय सहायता के बल पर मनीष अब अपने कारोबार के बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहे हैं और इसका दायरा बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि देश में पर्यावरण अनुकूल खेती को एक मुख्यधारा के विकल्प के रूप में स्थापित करना है ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को इसका सीधा लाभ मिल सके।

लाखों का टर्नओवर और देशव्यापी मांग

मनीष कुमार ने बातचीत में बताया कि उनके इन स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों की मांग केवल बिहार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों और महानगरों से भी लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। स्थानीय स्तर पर वे कॉल और व्हाट्सएप के जरिए ग्राहकों को सामान पहुंचाते हैं, जबकि दूर-दराज के इलाकों और दूसरे राज्यों में रहने वाले ग्राहकों के लिए वे अपनी ऑनलाइन वेबसाइट के माध्यम से उत्पाद भेजते हैं।

आज इस स्टार्टअप का टर्नओवर लाखों रुपये में पहुंच चुका है। मनीष का कहना है कि उनके पिता की बीमारी और मृत्यु ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि चीनी जैसी रोजमर्रा की चीजें किस तरह लोगों को बीमार कर रही हैं। इसी वजह से उन्होंने खजूर और ताड़ के गुड़ जैसे प्राकृतिक मीठे विकल्पों को बढ़ावा देना शुरू किया। उनका यह प्रयास आज रंग ला रहा है और देश भर के लोग उनके प्राकृतिक उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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