मां और दादी के नुस्खों से किरण ने बदली तकदीर, 28 तरह के मटका अचार से खड़ा किया लाखों का बिजनेस व्यापार 7 घंटे पहले 2
पूर्वी चंपारण की रहने वाली किरण देवी ने अपनी मां और दादी से मिले हुनर को एक सफल बिजनेस में बदल दिया है। आज वह अपने बनाए 28 तरह के मटका अचार से न केवल लाखों की कमाई कर रही हैं, बल्कि कई महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं।

पारंपरिक हुनर को बनाया आय का जरिया

पूर्वी चंपारण की रहने वाली किरण देवी की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। एक समय था जब उनका जीवन केवल घर की चारदीवारी और परिवार की जिम्मेदारियों तक ही सीमित था। घर संभालना और बच्चों की परवरिश करना ही उनकी दुनिया थी। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वह कभी घर से बाहर निकलकर किसी बड़े कारोबार का संचालन करेंगी। लेकिन आज किरण देवी एक सफल महिला उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। वह न केवल अपने हाथों से बने अचार और अन्य पारंपरिक उत्पादों को बाजार में बेचती हैं, बल्कि ग्राहकों से सीधे संवाद भी करती हैं। इस सफलता के पीछे वह जीविका से मिले सहयोग और मार्गदर्शन को सबसे बड़ा श्रेय देती हैं।

28 तरह के अचार और अन्य उत्पादों की खासियत

किरण देवी मुख्य रूप से पूर्वी चंपारण के मधुबन गांव की रहने वाली हैं। उनके इस काम में 10 से 12 अन्य महिलाएं भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। उनके उत्पादों की श्रृंखला बहुत विस्तृत है। किरण के यहां आम, कटहल, बड़हर, करेला, मिर्च, ओल, लहसुन, सहजन, बांस और आम का मीठा अचार समेत कुल 28 तरह के अचार तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा, वह मिलेट उत्पादों जैसे ज्वार-बाजरा, रोस्टेड तीसी, कुटा हुआ तीसी और कई तरह की अदौरी भी बनाती हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें आज भी पुरानी पारंपरिक पद्धतियों से घर के स्वाद के साथ तैयार किया जाता है।

अचार से शुरू हुआ सफर और आज की सफलता

किरण देवी बताती हैं कि उन्होंने साल 2019 में सरस मेले में जाना शुरू किया था, लेकिन अचार का औपचारिक व्यावसायिक काम उन्होंने 2022 से शुरू किया। शुरुआत बहुत छोटी थी, केवल आम के अचार के साथ। उन्होंने पहले इसे थोड़ी मात्रा में बनाकर बाजार में उतारा और ग्राहकों की प्रतिक्रिया जानी। जब लोगों को यह स्वाद पसंद आया और मांग बढ़ने लगी, तो उन्होंने धीरे-धीरे अन्य स्वादों को भी अपने काम में शामिल करना शुरू किया। किरण के अनुसार, अचार बनाने का यह हुनर उन्हें विरासत में अपनी मां और दादी से मिला था। बचपन से ही उन्होंने घर की रसोई में इन चीजों को बनते हुए देखा था। आज जीविका के माध्यम से इसी हुनर को एक बड़े मंच और पहचान मिली है।

10 हजार की पूंजी से 10 लाख तक का ऋण

किरण के बिजनेस की शुरुआत काफी साधारण तरीके से हुई थी। उन्होंने महज 10 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी से काम शुरू किया था। जीविका की सहायता से उन्होंने छोटी मशीनें खरीदीं और सत्तू तथा अदौरी का काम शुरू किया। धीरे-धीरे व्यवसाय में विस्तार होता गया और उन्हें जीविका की ओर से 1.30 लाख रुपये की और मदद मिली। इसके बाद उन्होंने 10 लाख रुपये का ऋण भी लिया, जिसकी किश्तें वह समय पर चुका रही हैं। उनका यह सफर एक आम के अचार से शुरू होकर आज 28 किस्म के अचार तक पहुँच गया है, जो उनके निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।

मटका अचार की खास पहचान

किरण देवी के उत्पादों में सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला उत्पाद मटके में पैक अचार है। उनका मानना है कि मिट्टी के मटके में अचार रखने से इसका पारंपरिक स्वाद और देसीपन बरकरार रहता है। यही कारण है कि ग्राहक डिब्बों के बजाय मटके में अचार खरीदना अधिक पसंद करते हैं। किरण इसे बिहार की मिट्टी और संस्कृति से जोड़कर देखती हैं। उनका कहना है कि जब अन्य राज्यों के उत्पाद अपनी पहचान बना सकते हैं, तो बिहार के पारंपरिक स्वादों को भी इसी तरह खास अंदाज में लोगों तक पहुँचना चाहिए। उनके उत्पादों की कीमत आमतौर पर 300 से 600 रुपये के बीच होती है।

परिवार की जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता

यह कारोबार किरण के लिए केवल पैसे कमाने का जरिया नहीं रहा, बल्कि उनके परिवार के लिए एक बड़ा सहारा भी बना है। किरण बताती हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं और उन तीनों का विवाह उन्होंने इसी कारोबार से हुई कमाई से संपन्न किया है। उनका बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है। वह गर्व के साथ कहती हैं कि अगर यह कारोबार शुरू नहीं किया होता, तो परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें शायद अपनी जमीन तक बेचने की नौबत आ जाती। उनके द्वारा खड़ा किया गया यह व्यवसाय अब उनके परिवार की बड़ी जिम्मेदारियों को उठाने में सक्षम हो गया है और कई अन्य महिलाओं को भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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