राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
आधुनिक युग में श्रवण कुमार की प्रेरणा
राजस्थान के सीकर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो मानवीय संवेदनाओं और धार्मिक श्रद्धा का अद्भुत संगम है। सावन के पवित्र महीने में आस्था और पारिवारिक संस्कारों की एक ऐसी मिसाल कायम हुई है, जिसने स्थानीय लोगों के दिलों को जीत लिया है। 21 साल के राहुल कुमार ने अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलते हुए कलयुग में श्रवण कुमार की भूमिका को चरितार्थ किया है। राहुल ने अपनी बुजुर्ग दादी लच्छी देवी को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर निकलने का साहसी निर्णय लिया है। उनकी यह यात्रा न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि यह साबित करती है कि आज के दौर में भी सेवा और संस्कार जीवित हैं।
45 किलोमीटर की अनोखी तीर्थ यात्रा
राहुल की यह पैदल कांवड़ यात्रा कुल 45 किलोमीटर की है। वे शेखावाटी के मिनी हरिद्वार के नाम से प्रसिद्ध तीर्थराज लोहार्गल की यात्रा कर रहे हैं। इस कठिन यात्रा की शुरुआत 20 अगस्त को दोपहर करीब 2 बजे हुई थी। राहुल गौमुख से पवित्र जल लेकर अपने गांव रामपुरा के लिए निकले हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने पहले दिन रात का विश्राम रामपुरा में किया, जबकि दूसरे दिन पिपराली में रुककर विश्राम लिया। यात्रा के तीसरे दिन जब वे सीकर पहुंचे, तो नगर सेठ के नाम से प्रसिद्ध कल्याण मंदिर में स्थानीय निवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया। योजना के अनुसार, राहुल 23 अगस्त की शाम तक अपने गांव वापस पहुंच जाएंगे।
कांवड़ का वजन और संतुलन का गणित
इस यात्रा की सबसे बड़ी चुनौती कांवड़ का वजन और दादी को बैठाकर संतुलन बनाए रखना है। राहुल ने बताया कि कांवड़ के दोनों पलड़ों का कुल वजन लगभग 81 किलो है। एक पलड़े में 42 किलो जल से भरी स्टील की मटकियां रखी गई हैं, जबकि दूसरे पलड़े में दादी लच्छी देवी एक चौकी पर विराजमान हैं। राहुल ने बताया कि शुरुआत में उनका विचार लोहार्गल से करीब एक क्विंटल जल लाने का था, लेकिन श्रवण कुमार के भजनों ने उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने सोचा कि कांवड़ में केवल जल लाना तो परंपरा का हिस्सा है, लेकिन अपनी दादी को तीर्थ दर्शन करवाना समाज के लिए एक बड़ा संदेश होगा। उन्होंने इस यात्रा को इसलिए चुना ताकि नई पीढ़ी को भी सेवा भाव की सीख मिल सके।
कठिन मार्ग पर अटूट संकल्प
लंबी दूरी तय करना और भारी वजन उठाना आसान काम नहीं है। राहुल कांवड़ के मुख्य बांस के चारों ओर फोम लपेटकर उसे मजबूत रस्सियों से बांधते हैं ताकि संतुलन पूरी तरह बना रहे। शारीरिक थकान के बावजूद राहुल का उत्साह कम नहीं है। वे हर 100 मीटर की दूरी तय करने के बाद कुछ देर रुकते हैं और आराम करते हैं। इस पूरे सफर में बनवारी लाल बरवड़, रोहित शर्मा, इंद्रपाल शेषमल और मनोज बरवड़ जैसे परिवार के अन्य सदस्य राहुल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं और उनका हौसला बनाए हुए हैं। भोलेनाथ का नाम लेते हुए राहुल का यह सफर अब अपने अंतिम चरण की ओर अग्रसर है।
भावुक कर देने वाली दादी की प्रतिक्रिया
कांवड़ में बैठी दादी लच्छी देवी के लिए यह अनुभव बेहद भावनात्मक रहा है। अपने पोते के इस प्रेम और समर्पण को देखकर वे भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि उनके नाती-पोते बहुत भाग्यशाली हैं जो उन्हें इस उम्र में तीर्थ यात्रा करवा रहे हैं। दादी लच्छी देवी ने नम आंखों से कहा कि अब तो श्मशान जाने का समय है, लेकिन इन बच्चों ने उन्हें जीवित रहते हुए ही पुण्य कमाने का अवसर दे दिया है। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि संसार के हर बुजुर्ग को राहुल जैसे सेवाभावी बच्चे और नाती-पोते मिलें। दादी के प्रति राहुल का यह प्रेम आज सीकर के हर घर में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग इस युवा की अटूट श्रद्धा को बार-बार सलाम कर रहे हैं।
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