सीधी की पारंपरिक पंजा दरी ने विदेश में मचाई धूम, हाथों की कारीगरी से कमा रहे हैं लाखों रुपये मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
मध्य प्रदेश के सीधी जिले में तैयार होने वाली हाथ से बुनी पंजा दरी की मांग अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ गई है, जिससे स्थानीय कारीगरों को हर महीने लाखों की आय हो रही है।

सीधी की कला को वैश्विक पहचान

मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक ऐसा पारंपरिक उद्योग फल-फूल रहा है, जिसकी चमक अब स्थानीय बाजारों से निकलकर सात समंदर पार तक पहुंच गई है। यहां के ग्राम खोरबा में तैयार होने वाली पंजा दरी अपनी अनूठी बनावट और खूबसूरती के लिए मशहूर हो रही है। इस दरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी बड़ी मशीन की सहायता से नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों द्वारा पूरी तरह से अपने हाथों से बुना जाता है। यही मानवीय मेहनत और बारीकी इसे बाजार में उपलब्ध अन्य उत्पादों से अलग खड़ा करती है।

पुश्तैनी काम से मिली अंतरराष्ट्रीय सफलता

इस कारोबार को आगे बढ़ाने वाले मोहम्मद जमीर ने अपने पुश्तैनी हुनर को जीवित रखा है। उन्होंने बताया कि शुरुआत के दिनों में उन्हें इस व्यापार में काफी आर्थिक उतार-चढ़ाव और नुकसान का सामना करना पड़ा था। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और अपने पारंपरिक काम को निरंतर जारी रखा। आज परिणाम यह है कि उनके द्वारा बनाई गई पंजा दरियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी जगह बना चुकी हैं। जमीर के अनुसार, अब वे विभिन्न कंपनियों के माध्यम से अपने उत्पाद विदेशों में भेज रहे हैं। वे अपना तैयार माल इन कंपनियों को सौंपते हैं, जो बाद में इन्हें विदेशी ग्राहकों तक पहुंचाती हैं। इस प्रकार, सीधी के एक छोटे से गांव का हुनर आज वैश्विक पहचान हासिल कर चुका है।

हाथों की बारीकी और खास डिजाइन

पंजा दरी की निर्माण प्रक्रिया काफी श्रमसाध्य है। कारीगर बड़ी कुशलता से धागे को आपस में पिरोते हैं और मनमोहक डिजाइन तैयार करते हैं। इसमें किसी भी तरह की मशीनी तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता। प्रत्येक दरी में कारीगरों की कड़ी मेहनत और उनका कलात्मक दृष्टिकोण झलकता है। दरियों के अलग-अलग आकार और डिजाइन इसे किसी भी घर की सजावट के लिए आकर्षक बनाते हैं। कारीगरों की यह मेहनत ही है जिसकी वजह से हर दरी की अपनी एक विशिष्ट पहचान और मांग बनी रहती है।

कमाई और बाजार का गणित

मोहम्मद जमीर के अनुसार, पंजा दरी की कीमत उसके साइज और डिजाइन की जटिलता के आधार पर निर्धारित की जाती है। वर्तमान में इसकी कीमत 3500 रुपये से शुरू होकर 7000 रुपये तक पहुंचती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थानीय स्तर के मुकाबले विदेशी बाजार में इन दरियों की भारी मांग है। इस निर्यात आधारित व्यापार से उन्हें हर महीने लगभग 2 से 2.5 लाख रुपये की शानदार कमाई हो रही है। यह आय न केवल उनके परिवार के भरण-पोषण में सहायक है, बल्कि उनके कारखाने में काम करने वाले कई अन्य कारीगरों के लिए भी आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनी हुई है।

सीधी की पंजा दरी की यह सफलता गाथा इस बात का प्रमाण है कि यदि पारंपरिक कौशल को सही दिशा और वैश्विक बाजार का मंच मिल जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर भी एक बड़े और सफल कारोबार की नींव रखी जा सकती है। यह हुनर न केवल आर्थिक मजबूती देता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने गर्व से प्रस्तुत भी करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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