शेयर बाजार के लिए बड़ी खबर: मुंबई के बाहर फिर से गुलजार हो सकता है कलकत्ता का ऐतिहासिक स्टॉक एक्सचेंज व्यापार एक घंटा पहले 4
देश के शेयर बाजार परिदृश्य में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है क्योंकि सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कलकत्ता शेयर बाजार को फिर से शुरू करने के संकेत दिए हैं। यदि यह एक्सचेंज सभी नियामक मानकों को पूरा करता है, तो साल 2013 के बाद एक बार फिर यहां से कारोबार शुरू हो पाएगा।

मुंबई के बाहर स्टॉक मार्केट की वापसी की तैयारी

भारतीय शेयर बाजार में अभी तक पूरी तरह से मुंबई का दबदबा कायम है, जहां से मुख्य तौर पर बीएसई और एनएसई अपना कामकाज संचालित करते हैं। हालांकि, अब बाजार नियामक सेबी ने संकेत दिए हैं कि देश के पूर्वी हिस्से में शेयर बाजार की रौनक फिर लौट सकती है। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने हाल ही में कहा है कि एक सदी से अधिक पुराना कलकत्ता शेयर बाजार जिसे सीएसई के नाम से जाना जाता है, उसे दोबारा शुरू करने पर विचार किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल सरकार ने इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा है, जिसके बाद से ही यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

क्या हैं सेबी की शर्तें और चुनौतियां

तुहिन कांत पांडेय के अनुसार, किसी भी पुराने या नए शेयर बाजार को शुरू करने के लिए केवल इच्छाशक्ति काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए कड़े मानकों का पालन करना अनिवार्य है। सेबी ने स्पष्ट किया है कि यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इसके लिए तीन मुख्य आधारों पर समीक्षा की जाएगी। इसमें शामिल हैं:

  • बाजार में कारोबार की पर्याप्त मात्रा का होना।
  • एक टिकाऊ और मजबूत कारोबारी मॉडल का निर्माण।
  • आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे में निवेश करने की क्षमता।

सेबी चेयरमैन ने जोर देते हुए कहा कि आज के दौर में जब इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग का बोलबाला है, निवेशक दुनिया के किसी भी कोने से बाजार में सीधे जुड़ सकते हैं। ऐसे में किसी भी नए एक्सचेंज को शुरू करने से पहले उसकी व्यवहार्यता और नकदी की स्थिति पर विचार करना बहुत जरूरी है। प्रवर्तकों को यह सिद्ध करना होगा कि उनके मंच पर इतने ग्राहक और वॉल्यूम मौजूद हैं कि संचालन को लंबे समय तक बनाए रखा जा सके।

कलकत्ता शेयर बाजार का इतिहास और बंद होने की वजह

कलकत्ता शेयर बाजार की शुरुआत साल 1908 में हुई थी और उस समय के अंग्रेजी शासन काल में यह भारत में व्यापार का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। समय बीतने के साथ बाजार के नियम बदले और डिजिटल क्रांति आई। मुंबई में स्थित बीएसई और एनएसई के पूरी तरह से डिजिटल और आधुनिक स्वरूप में विकसित होने के बाद अप्रैल 2013 में कलकत्ता शेयर बाजार में ट्रेडिंग को पूरी तरह बंद कर दिया गया था।

इस बंदी के पीछे का मुख्य कारण सेबी के वे कड़े नियम थे, जिनमें क्लीयरिंग कॉरपोरेशन की अनिवार्यता लागू की गई थी। उस समय कलकत्ता शेयर बाजार के पास अपनी स्वयं की मान्यता प्राप्त क्लीयरिंग कॉरपोरेशन की व्यवस्था नहीं थी, जो कि सेबी के नए निर्देशों के अनुसार अनिवार्य कर दी गई थी। नतीजतन, सेटलमेंट की अलग व्यवस्था न हो पाने के कारण इस एक्सचेंज पर ताला लग गया।

कभी बीएसई से भी ज्यादा था दबदबा

कलकत्ता शेयर बाजार का अतीत बेहद स्वर्णिम रहा है। एक समय ऐसा भी था जब यह देश के सबसे प्रमुख एक्सचेंजों में गिना जाता था। साल 1997 से लेकर 2000 के बीच का दौर ऐसा था, जब कलकत्ता शेयर बाजार में होने वाली ट्रेडिंग का वॉल्यूम मुंबई के बीएसई से भी अधिक दर्ज किया गया था। यद्यपि पिछले 13 वर्षों से यहां कोई सक्रिय कारोबार नहीं हुआ है, लेकिन यह एक्सचेंज अभी भी पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है और सेबी के रेगुलेशन के दायरे में बना हुआ है। अब देखना यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार का यह नया प्रस्ताव सेबी की समीक्षा में कितना खरा उतरता है और क्या देश को एक बार फिर से एक क्षेत्रीय शेयर बाजार के रूप में कलकत्ता के रूप में एक और विकल्प मिल पाएगा या नहीं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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