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3 घंटे पहले
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गिरफ्तारी की प्रक्रिया
श्रीलंका में राजनीतिक हलकों में उस समय खलबली मच गई जब विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता सागर करियावासम को कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया। अधिकारियों के अनुसार, उन्हें सेंट्रल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो में एक मामले के सिलसिले में अपना बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया गया था। पूछताछ का मुख्य केंद्र पुलिस महानिरीक्षक प्रियंथा वीरासुरिया के खिलाफ की गई उनकी हालिया टिप्पणियां थीं। पूछताछ की प्रक्रिया के बाद उन्हें औपचारिक रूप से हिरासत में ले लिया गया। पुलिस का स्पष्ट कहना है कि करियावासम पर पुलिस प्रमुख को सार्वजनिक रूप से धमकाने का गंभीर आरोप है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और आरोप
सागर करियावासम राजपक्षे परिवार की अगुवाई वाली पार्टी श्रीलंका पोडुजाना पेरामुना (SLPP) के महासचिव के रूप में कार्यरत हैं। विवाद की जड़ पिछले सप्ताह पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक मीडिया ब्रीफिंग है। उस दौरान करियावासम ने पुलिस महानिरीक्षक पर यह आरोप लगाया था कि वे सरकार के इशारों पर काम करने वाले एक मोहरे या गुर्गे की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने पुलिस प्रमुख को सचेत करते हुए कहा था कि उन्हें सरकार की सेवा करने के बजाय देश और वहां की जनता के हितों के लिए कार्य करना चाहिए। अब पार्टी ने इस गिरफ्तारी को विपक्षी नेताओं के खिलाफ सरकार द्वारा की जा रही प्रतिशोध की राजनीति करार दिया है और इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया है।
कानूनी कार्रवाई का माहौल
श्रीलंका की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्षी दलों के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कानूनी मामले चल रहे हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान, कई प्रमुख हस्तियों को अदालतों ने दोषी करार दिया है या उन्हें सजा सुनाई है। इस घटनाक्रम को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। श्रीलंका पोडुजाना पेरामुना का आरोप है कि सरकार कानून का सहारा लेकर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने की एक सुनियोजित मुहिम चला रही है।
पूर्व पुलिस प्रमुख को मौत की सजा
इसी बीच श्रीलंका की अदालतों ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में कड़ा रुख अपनाया है। वर्ष 2019 के ईस्टर संडे आतंकी हमले के मामले में श्रीलंका के पूर्व पुलिस प्रमुख पुजित जयसुंदरा और तत्कालीन रक्षा नौकरशाह हेमासिरी फर्नांडो को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। 21 अप्रैल 2019 को हुए इन भीषण आत्मघाती बम धमाकों ने देश को हिलाकर रख दिया था। चर्चों और लग्जरी होटलों को निशाना बनाकर किए गए इन हमलों में कुल 279 लोगों की जान गई थी, जिनमें 45 विदेशी नागरिक भी शामिल थे। उच्च न्यायालय ने माना कि इन दोनों अधिकारियों के पास हमलों को लेकर खुफिया सूचनाएं पहले ही उपलब्ध थीं, लेकिन उन्होंने उन पर उचित कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि यदि समय रहते कदम उठाए गए होते, तो इन 270 से अधिक लोगों की जान बचाई जा सकती थी। दोनों अधिकारियों को घटना के बाद वर्ष 2019 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था।
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