सतपुतिया की खेती से बंपर मुनाफा, 10 हजार की लागत पर 1.40 लाख की कमाई, म्यूचुअल फंड भी फेल झारखंड 2 घंटे पहले 5
बोकारो के एक किसान ने मचान विधि से सतपुतिया की खेती कर सबको हैरान कर दिया है, जहां कम खर्च में लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा मिल रहा है।

खेती में आधुनिकता का कमाल

बोकारो के प्रगतिशील किसान संदीप ने खेती के क्षेत्र में सफलता की एक नई कहानी लिखी है। उन्होंने बहुत ही सीमित संसाधनों और कम निवेश के साथ ऐसी तकनीक अपनाई है कि आज उनकी खेती का तरीका आसपास के इलाकों में चर्चा का विषय बन गया है। संदीप ने 60 डिसमिल जमीन पर वैज्ञानिक मचान विधि का इस्तेमाल करते हुए सतपुतिया की खेती की है। उनकी इस मेहनत का परिणाम यह है कि महज 10 हजार रुपये की लागत लगाकर उन्होंने 50 क्विंटल से भी अधिक का बंपर उत्पादन हासिल किया है। इससे उन्हें कुल 1.40 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ है, जो कई अन्य निवेशों के मुकाबले काफी बेहतर है।

खेती की शुरुआत और तकनीक

संदीप बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से कृषि कार्य से जुड़ा हुआ है। हालांकि, पारंपरिक खेती के बजाय उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाना बेहतर समझा। उन्होंने स्वयं ही इंटरनेट और यूट्यूब जैसे डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर नई कृषि विधियों के बारे में जानकारी जुटाई और उन्हें अपने खेतों में उतारा। इसी कड़ी में उन्होंने जुलाई के अंतिम सप्ताह में सतपुतिया की बुवाई की योजना बनाई। मचान विधि से खेती करने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि पौधे जमीन के संपर्क में कम आते हैं, जिससे फसल सड़ने का खतरा नहीं रहता और पैदावार की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है।

मुनाफे का गणित

संदीप के अनुसार, सतपुतिया की फसल का चक्र काफी उत्पादक होता है। एक बार तैयार होने के बाद, यह फसल 2 से 3 महीने तक लगातार उत्पादन देती रहती है। उनके द्वारा अपनाए गए प्रबंधन का ही नतीजा है कि 60 डिसमिल के छोटे से खेत से 50 क्विंटल सतपुतिया प्राप्त हुआ है। बाजार में मौजूदा भाव पर नजर डालें तो इसका औसत मूल्य करीब 30 रुपये प्रति किलो मिल जाता है। यदि हम गणित के नजरिए से देखें तो 50 क्विंटल की उपज को बेचने पर कुल 1.50 लाख रुपये की आमदनी होती है। इस कुल कमाई में से शुरुआती 10 हजार रुपये की लागत घटा देने के बाद, किसान के हाथ में 1.40 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा बचता है।

कीटों से बचाव और फसल प्रबंधन

संदीप का कहना है कि सतपुतिया की खेती में फल मक्खी जैसे कीटों का खतरा हमेशा बना रहता है। ये कीट फलों में छेद कर देते हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता खराब हो सकती है और पैदावार में भारी कमी आ सकती है। इससे निपटने के लिए वे कृषि विशेषज्ञों की सलाह को बेहद जरूरी मानते हैं। उनका सुझाव है कि सही समय पर जैविक कीटनाशकों का प्रयोग और फसल का उचित प्रबंधन करना चाहिए। सही देखरेख से न केवल इन कीटों के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है, बल्कि फसल को नुकसान से बचाकर अधिकतम उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है। उनकी यह सफलता साबित करती है कि यदि किसान सही जानकारी और तकनीक का तालमेल बिठा ले, तो कम जमीन से भी मालामाल हुआ जा सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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