चीता बनाम टाइगर: जब जंगल में आमने-सामने होंगे दो दिग्गज, तो कौन मारेगा बाजी? जानिए विशेषज्ञों की राय मध्य प्रदेश 2 महीने पहले 62
मध्य प्रदेश के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में जल्द ही चीतों की दस्तक होने वाली है, जिससे वन्यजीव प्रेमियों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जंगल का राजा बाघ और रफ्तार का सौदागर चीता एक साथ सुरक्षित रह पाएंगे।

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में नई हलचल

मध्य प्रदेश का वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व इन दिनों वन्यजीव प्रेमियों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस रिजर्व में अब पर्यटकों को बाघ और तेंदुए के अलावा चीतों का भी दीदार करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यह स्थिति वन्यजीवों के एक अनूठे संगम को जन्म देने वाली है। हालांकि, पर्यटकों के लिए यह रोमांचक होगा, लेकिन जानकारों और वन्यजीव प्रेमियों की नजर इस बात पर टिकी है कि जब जंगल के दो अलग-अलग शिकारी एक ही क्षेत्र में होंगे, तो उनका व्यवहार कैसा होगा। लोगों के मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि अगर कभी चीता और बाघ का आमना-सामना हुआ, तो जंगल का सिकंदर कौन साबित होगा।

इतिहास और पारिस्थितिकी का नजरिया

इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करते हुए वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश सिंह ने महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने बताया कि हमारे देश से चीते करीब 50 से 70 साल पहले विलुप्त हो गए थे। इतिहास गवाह है कि उससे पहले चीते और बाघ हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में साथ-साथ फलते-फूलते थे। सरगुजा, सिंगरौली का क्षेत्र, होशंगाबाद जिला और नर्मदा नदी के किनारे के मैदानी इलाके कभी चीतों का प्राकृतिक आवास हुआ करते थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीतों के विलुप्त होने का कारण बाघ नहीं थे, बल्कि इंसानों द्वारा किया गया अंधाधुंध शिकार था।

प्रकृति का संतुलन और वन्यजीवों का व्यवहार

वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रकृति ने हर जीव को एक विशेष संतुलन के साथ बनाया है। वन्यजीव भविष्य की चिंता नहीं करते, वे केवल अपने वर्तमान और अपनी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। बाघ, चीता, तेंदुआ और शेर जैसे जानवर हमेशा से एक ही भौगोलिक क्षेत्र में सह-अस्तित्व के साथ रहते आए हैं। उनका शिकार का तरीका और भोजन की प्राथमिकताओं में भी भिन्नता होती है। ये शिकारी केवल अपने भोजन के लिए शिकार करते हैं और कोई भी प्राणी अनावश्यक हिंसा नहीं करता है।

आमना-सामना होने पर क्या होगा?

डिप्टी डायरेक्टर के अनुसार, अगर कभी जंगल में चीते और बाघ का आमना-सामना होता है, तो मुख्य रूप से दो स्थितियां बन सकती हैं। पहली स्थिति में, चीता बाघ को देखकर डर सकता है और वहां से तेजी से भाग सकता है, क्योंकि बाघ की शारीरिक शक्ति अधिक होती है। दूसरी तरफ, यदि चीते झुंड में या कोलिशन में हैं, तो स्थिति बदल सकती है। यदि 2 या 3 चीते एक साथ हैं, तो बाघ भी उनसे सीधा मुकाबला करने से बचने की कोशिश करेगा। मध्य प्रदेश के जंगलों में हमने कई बार देखा है कि यदि 3 सोन कुत्ते भी एक साथ आ जाएं, तो बाघ के लिए उनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है। वन्यजीवों का इकोसिस्टम इसी तरह चलता है। व्यावहारिक रूप से कहें तो बाघ से चीतों को कोई सीधा खतरा नहीं है, और ऐसी स्थिति में जो अपनी सूझबूझ और ताकत का बेहतर प्रदर्शन करेगा, वही जंगल का सिकंदर कहलाएगा।

तैयारियां और आगे का रोडमैप

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में चीतों को लाने की कवायद साल 2014 से ही चल रही है। वर्तमान में यहां विस्थापन की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस परियोजना को प्राथमिकता देते हुए इसके लिए बजट की भी घोषणा की थी। वर्तमान स्थिति यह है कि इस प्रोजेक्ट का लगभग 90% काम पूरा हो चुका है। उम्मीद जताई जा रही है कि इसी साल जुलाई के बाद किसी भी समय चीतों को यहां बाड़े में छोड़ा जा सकता है। सरकार और वन विभाग का पूरा प्रयास है कि इन जानवरों को सुरक्षित वातावरण मिल सके ताकि वे अपने प्राकृतिक आवास में फिर से अपनी संख्या बढ़ा सकें।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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