बिना मशीन और सेंसर के चमत्कार, लकड़ी और नारियल से जमीन के अंदर पानी ढूंढ रहे सागर के रेवाराम मध्य प्रदेश 3 घंटे पहले 4
मध्य प्रदेश के सागर जिले में रहने वाले 62 वर्षीय रेवाराम पटेल पिछले 37 वर्षों से पारंपरिक तरीकों का उपयोग कर जमीन के भीतर पानी की सटीक स्थिति का पता लगा रहे हैं। उनकी इस अनोखी कला के मुरीद केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के लोग भी हैं।

टेक्नोलॉजी के दौर में पुरानी परंपरा

आज के आधुनिक युग में जब जमीन के भीतर पानी की खोज के लिए बड़ी-बड़ी मशीनों और अत्याधुनिक सेंसर का इस्तेमाल किया जा रहा है, तब भी बुंदेलखंड के सागर जिले में एक ऐसा व्यक्ति है जो इन उपकरणों के बिना ही पानी की सटीक लोकेशन बता देता है। सागर के बाघराज पंडापुरा निवासी 62 वर्षीय रेवाराम पटेल पिछले 37 वर्षों से इस कला में महारत हासिल कर चुके हैं। वे अपनी पारंपरिक विधा के जरिए न केवल कुओं बल्कि बोरवेल के लिए भी सही जगह चुनते हैं, जिससे लोगों के पैसे और मेहनत बर्बाद नहीं होती।

दूर-दूर तक है रेवाराम की पहचान

रेवाराम पटेल की ख्याति केवल सागर तक ही सीमित नहीं है। उनकी इस अनोखी क्षमता के कारण उन्हें विदिशा, रायसेन, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर जैसे जिलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और मद्रास तक से बुलावा आता है। उन्होंने अब तक हजारों की संख्या में कुओं और बोरवेल के लिए सटीक स्थान चिन्हित किए हैं। लोग महंगी मशीनों पर भरोसा करने के बजाय रेवाराम के पास जाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका अनुभव और तरीका काफी भरोसेमंद माना जाता है।

पानी की तलाश का देसी तरीका

बोरवेल के लिए जमीन का चयन करना एक बड़ी चुनौती होती है। लोग चाहते हैं कि ऐसी जगह पर खुदाई हो जहां पानी की अच्छी झिर मिल सके, ताकि उनकी निवेश की गई रकम बेकार न जाए। हालांकि आजकल बाजार में तकनीकी उपकरण उपलब्ध हैं जो पानी का पता बताते हैं, लेकिन इनका शुल्क काफी अधिक होता है। इसके विपरीत, रेवाराम पटेल नारियल, अगरबत्ती, नींबू, लकड़ी, हाथ घड़ी, तांबे का लोटा, रस्सी और सिक्कों का उपयोग करके पानी का सटीक अनुमान लगा लेते हैं।

कैसे काम करते हैं ये अनोखे उपकरण

रेवाराम का पानी ढूंढने का तरीका विज्ञान के चश्मे से परे एक चमत्कार जैसा प्रतीत होता है। उनके द्वारा अपनाई जाने वाली कुछ प्रमुख पद्धतियां इस प्रकार हैं:

  • नारियल: जब वे अपनी हथेली पर नारियल रखकर चलते हैं, तो पानी वाली जगह पर पहुंचते ही वह अपने आप खड़ा हो जाता है।
  • हाथ घड़ी: एक रस्सी में हाथ घड़ी बांधकर चलने पर, पानी की उपलब्धता के अनुसार घड़ी और रस्सी अपने आप घूमने लगते हैं। पानी की मात्रा अधिक होने पर इसकी गति तेज हो जाती है।
  • नींबू: हथेली पर नींबू रखकर चलने पर भी वह पानी वाली जगह पर अपने आप घूमने लगता है।
  • लकड़ी: दोनों हाथों में लकड़ी पकड़कर चलने पर, पानी के स्रोत के ऊपर वह इतनी तीव्रता से घूमती है कि उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।
  • लोटा और सिक्का: तांबे के लोटे के ऊपर सिक्का रखकर चलने पर, जमीन के नीचे पानी होने की स्थिति में सिक्का लोटे से चिपक जाता है।
  • तांबे की रॉड: जब तांबे की दो रॉड हाथों में ली जाती हैं, तो पानी वाले स्थान पर वे आपस में चुंबक की तरह जुड़ जाती हैं।

कठिन अनुशासन और नियम

रेवाराम का मानना है कि उन्हें यह विद्या सिद्ध बाबा की कृपा से प्राप्त हुई है। अपने इस कार्य को वे पूरे अनुशासन के साथ करते हैं। जिस दिन उन्हें पानी की तलाश के लिए निकलना होता है, उस दिन वे अनिवार्य रूप से उपवास रखते हैं। उनकी एक विशेष शर्त यह भी है कि जिस व्यक्ति के लिए वे पानी देखते हैं, जब तक बोरवेल सफल नहीं हो जाता और वहां भंडारा या कथा का आयोजन नहीं हो जाता, तब तक वे उस स्थान का पानी नहीं पीते हैं।

वे बताते हैं कि आसपास के कई गांवों और दूर-दराज के जिलों से लोग खुद उन्हें लेने आते हैं और काम पूरा होने के बाद वापस छोड़ जाते हैं। वे अपनी इस सेवा के बदले कोई बड़ा शुल्क नहीं मांगते, बल्कि केवल सिद्ध बाबा का प्रसाद स्वीकार करते हैं। रेवाराम का यह सफर पिछले तीन दशकों से अधिक समय से जारी है और वे निस्वार्थ भाव से समाज की इस मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने में सहयोग दे रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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