विश्व
एक घंटा पहले
6
विचारों
संयुक्त राष्ट्र में बढ़ा अमेरिका और क्यूबा का तनाव
न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा में मंगलवार का दिन काफी हंगामेदार रहा। इस दौरान अमेरिका और क्यूबा के प्रतिनिधियों के बीच जो वाकयुद्ध हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया। यह टकराव तब शुरू हुआ जब क्यूबा पर दशकों से चले आ रहे अमेरिकी आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों को समाप्त करने के लिए एक प्रस्ताव पर चर्चा की जा रही थी। विवाद इतना बढ़ गया कि सभा की कार्यवाही को कुछ समय के लिए बाधित करना पड़ा और अधिकारियों को बीच-बचाव के लिए आगे आना पड़ा। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव इस घटना में खुलकर सामने आ गया, जिसके बाद से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
विवाद की शुरुआत और माइक वॉल्ट्ज का आक्रामक रुख
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र में तैनात अमेरिकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना कर रहे थे। उन्होंने क्यूबा पर भ्रष्टाचार और अपने नागरिकों के दमन का गंभीर आरोप लगाया। इसी दौरान क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पैरिला पोडियम के नजदीक पहुंचे और अमेरिकी प्रतिनिधि को अपनी बात रखने से रोकने की मांग की। क्यूबन मंत्री के इस कदम पर माइक वॉल्ट्ज बुरी तरह भड़क गए।
माइक वॉल्ट्ज ने कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र है, कोई क्यूबा की कम्युनिस्ट तानाशाही नहीं है। उन्होंने क्यूबा के विदेश मंत्री से साफ शब्दों में कहा कि वे उन्हें चुप नहीं करा सकते। स्थिति तब और ज्यादा तनावपूर्ण हो गई जब माइक वॉल्ट्ज ने क्यूबा के प्रतिनिधिमंडल को पीछे हटने के लिए कहा। उन्होंने तीखे और आक्रामक लहजे में पूछा कि क्या उन्हें पता है कि वे किससे बात कर रहे हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यह अमेरिका है और उन्हें पीछे हट जाना चाहिए। माहौल को और अधिक खराब होता देख सत्र की अध्यक्षता कर रहे अधिकारी ने फौरन हस्तक्षेप किया और कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया। दोनों ही देशों के प्रतिनिधिमंडलों को वापस अपनी निर्धारित सीटों पर बैठने का निर्देश दिया गया।
क्यूबा के विदेश मंत्री ने अमेरिका पर लगाए आरोप
दूसरी ओर, क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पैरिला ने अमेरिका पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को अनुचित तरीके से प्रभावित करने का गंभीर इल्जाम लगाया। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करवाने के लिए दुनिया भर के देशों को धमका रहा है। मंत्री के अनुसार, वाशिंगटन द्वारा वीजा प्रतिबंधों और आर्थिक प्रतिबंधों का डर दिखाकर दूसरे देशों को अमेरिका के पक्ष में वोट करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो देश इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, उनकी सरकारों के विपक्ष में सक्रिय लोगों को अमेरिका द्वारा समर्थन देने की बात कही जा रही है। वहीं, माइक वॉल्ट्ज ने पूरी दुनिया के सामने संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों से क्यूबा के पक्ष में आए इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर खारिज करने की अपील की।
वर्ष 1992 से जारी है यह कूटनीतिक संघर्ष
क्यूबा और अमेरिका के बीच का यह संघर्ष कोई नया नहीं है। क्यूबा वर्ष 1992 से ही लगातार हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त करने की मांग को लेकर प्रस्ताव पेश करता आ रहा है। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के ये प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन इन्हें वैश्विक स्तर पर काफी ज्यादा समर्थन मिलता रहा है।
आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले वर्ष इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 165 देशों ने मतदान किया था। वहीं, इस प्रस्ताव के विरोध में 7 देशों ने अपना मत दिया और 12 देश मतदान प्रक्रिया से पूरी तरह दूर रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों के मुकाबले यह इस प्रस्ताव के लिए अब तक का सबसे कमजोर समर्थन दर्ज किया गया है। अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों और तेल की आपूर्ति में कटौती के कारण क्यूबा की पहले से ही खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर दबाव और ज्यादा बढ़ गया है। यह घटना केवल एक मामूली बहस नहीं थी, बल्कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने गहरे संघर्ष की एक बानगी भर है।
Comments
0 comment