देवघर यात्रा हो जाएगी अधूरी, अगर सिंह दरवाजे के पास इस 50 साल पुरानी दुकान का मोहनभोग नहीं चखा जीवनशैली एक घंटा पहले 3
बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में दर्शन के साथ-साथ यहां का पारंपरिक मोहनभोग भी श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय है, जिसकी मिठास बीते 50 वर्षों से बरकरार है। सिंह दरवाजा के निकट स्थित यह दुकान रोजाना 50 किलो मोहनभोग की बिक्री कर अपनी खास पहचान बनाए हुए है।

देवघर की धार्मिक पहचान और खानपान का अनूठा संगम

देवघर को केवल तीर्थ स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि यहां की विशिष्ट पाक कला के लिए भी जाना जाता है। बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए सालभर देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। हालांकि, बाबा की नगरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक आप यहां के प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद न ले लें। देवघर की तंग और पुरानी गलियों में ऐसे कई जायके छिपे हैं, जो स्वाद के शौकीनों को दीवाना बना देते हैं। इनमें से सबसे प्रमुख है मंदिर के सिंह दरवाजे के निकट मिलने वाला प्रसिद्ध मोहनभोग। यह व्यंजन न केवल स्थानीय लोगों की पसंद है, बल्कि दूर-दराज से आने वाले भक्त भी इसे प्रसाद की तरह बड़े चाव से ग्रहण करते हैं।

सिंह दरवाजे के पास मिलती है खास महक

जब भी कोई श्रद्धालु बाबा मंदिर के सिंह दरवाजे के पास पहुंचता है, तो उसे एक मनमोहक खुशबू अपनी ओर खींचने लगती है। यह खुशबू मोहनभोग की होती है, जो शुद्ध देशी घी, सूजी, खोवा और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवों के मिश्रण से तैयार की जाती है। इस व्यंजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बनाने में किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं की जाती है। एक बैच तैयार करने में करीब 6 से 7 घंटे का लंबा समय लगता है, जिससे इसकी गुणवत्ता और स्वाद अन्य सामान्य मिठाइयों से बिल्कुल अलग और लाजवाब हो जाता है। यही कारण है कि मंदिर दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भी यहां रुककर इस गर्मागर्म मोहनभोग का लुत्फ उठाना नहीं भूलते हैं। इसे फलाहार के रूप में भी ग्रहण किया जाता है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

50 साल पुरानी विरासत और परंपरा

दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे इस व्यंजन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि उनकी दुकान का सफर करीब 50 साल से भी अधिक पुराना है। इतने दशकों के बावजूद, उन्होंने मोहनभोग तैयार करने की अपनी पारंपरिक विधि में कोई बदलाव नहीं किया है। बाजार में भले ही आज कई तरह के नए और आधुनिक व्यंजन आ गए हों, लेकिन मोहनभोग का आकर्षण आज भी वैसा ही बना हुआ है। सिंह दरवाजा की गलियों में स्थित यह छोटी सी दुकान आज एक बड़े ब्रांड की तरह जानी जाती है। ग्राहक यहां पीढ़ियों से आ रहे हैं और इसकी मिठास उन्हें बार-बार यहां खींच लाती है।

रोजाना 50 किलो की भारी मांग

दुकान पर भीड़ का आलम यह रहता है कि रोजाना लगभग 50 किलो मोहनभोग की खपत हो जाती है। भक्त मंदिर में दर्शन के बाद इसे प्रसाद स्वरूप अपने साथ ले जाते हैं। लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देवघर से बाहर रहने वाले लोग भी इस व्यंजन को मंगवाकर इसका स्वाद लेते हैं। ग्राहक अमन द्वारी, जो पिछले 20 वर्षों से यहां के नियमित ग्राहक हैं, कहते हैं कि शुद्ध घी और खोवा के इस्तेमाल के कारण इसका स्वाद बिल्कुल अलग होता है। जैसे ही इसे मुंह में रखा जाता है, यह घुल जाता है। फिलहाल, इस मोहनभोग की कीमत 200 रुपये प्रति किलो तय की गई है, जो इसकी गुणवत्ता के हिसाब से काफी उचित है।

अन्य स्वादिष्ट विकल्प भी मौजूद

केवल मोहनभोग ही नहीं, बल्कि इस दुकान पर मिलने वाली लस्सी और गाजर का हलवा भी ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है। लोग अपनी पसंद के अनुसार इन चीजों का आनंद लेते हैं। देवघर की गलियों में बिखरी मोहनभोग की यह सौंधी खुशबू लोगों को अपनी यादों में बसाने के लिए काफी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बाबा बैद्यनाथ की नगरी में आध्यात्मिकता के साथ-साथ पारंपरिक स्वाद का यह संगम श्रद्धालुओं की यात्रा को यादगार बना देता है। पांच दशकों से चला आ रहा यह सिलसिला आज भी देवघर की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बना हुआ है और लोग इस स्वाद के कारण सिंह दरवाजे के पास रुकने पर मजबूर हो जाते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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