झारखंड
2 घंटे पहले
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विचारों
झारखंड की संस्कृति और हड़िया का विज्ञान
झारखंड के आदिवासी समाज में हड़िया का महत्व केवल एक पेय के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृति के अभिन्न अंग के तौर पर रहा है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय की रिसर्चर डॉ. सुकन्या हेंब्रम ने हड़िया की वैज्ञानिक उपयोगिता को समझने के लिए पिछले 7 साल तक गहन अध्ययन किया है। इस शोध का उद्देश्य हड़िया बनाने की पारंपरिक विधि और इसमें इस्तेमाल होने वाले रानू के औषधीय प्रभावों को आधुनिक लैब के माध्यम से समझना था।
कैसे तैयार होती है यह पारंपरिक ड्रिंक
हड़िया मुख्य रूप से चावल को फर्मेंट करके यानी खमीर उठाकर बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में रानू का उपयोग सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। रानू कोई साधारण सामग्री नहीं है, बल्कि इसे विभिन्न प्रकार के पेड़ों की पत्तियों और उनकी छाल को मिलाकर तैयार किया जाता है। यही वह घटक है जो हड़िया को विशेष स्वाद और औषधीय गुण प्रदान करता है।
क्या कहती है लैब जांच की रिपोर्ट
रिसर्च के दौरान जब हड़िया को वैज्ञानिक परीक्षणों से गुजारा गया, तो इसके परिणाम काफी चौंकाने वाले रहे। लैब जांच में मुख्य रूप से दो बातें सामने आई हैं:
- एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी: शोध में पाया गया कि हड़िया में शरीर के लिए लाभकारी एंटीऑक्सीडेंट तत्व पर्याप्त मात्रा में होते हैं।
- एंटीमाइक्रोबियल गुण: अध्ययन के दौरान हड़िया के एंटीमाइक्रोबियल पहलुओं की भी जांच की गई, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
यह शोध न केवल हड़िया के प्रति समाज के नजरिए को बदलने का काम करेगा, बल्कि आदिवासी खानपान में छिपे वैज्ञानिक पहलुओं को भी दुनिया के सामने लाता है।
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