झारखंड
एक दिन पहले
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विचारों
राजनीति में कुछ फैसले महज चुनाव जीतने के लिए लिए जाते हैं और कुछ आने वाले वर्षों की सियासत की नींव रखने के लिए। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने शिबू सोरेन के निधन से खाली हुई राज्यसभा सीट पर बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाकर शायद दूसरा रास्ता चुना है। जिस सीट पर परिवार के किसी सदस्य की दावेदारी सबसे प्रबल मानी जा रही थी, वहां एक आदिवासी नेता का नाम सामने आना अपने आप में चौंकाने वाला है। ऊपरी तौर पर यह एक सामान्य राजनीतिक निर्णय लगता है, पर इसके पीछे गहरी रणनीतिक तैयारी की कई परतें छिपी हैं।
एक सीट जिस पर सबकी निगाहें टिकीं
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उसी सीट को लेकर है जो झामुमो संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन के बाद रिक्त हुई थी। लंबे समय तक राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाए जाते रहे कि पार्टी इस सीट पर सोरेन परिवार के किसी सदस्य को भेज सकती है। संगठन के भीतर और बाहर कई नाम चर्चा में आए। लेकिन जब झामुमो ने लातेहार के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को प्रत्याशी घोषित किया तो यह निर्णय कई राजनीतिक संदेश दे गया। जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ एक उम्मीदवार का चयन नहीं, बल्कि हेमंत सोरेन की दूरगामी रणनीति का हिस्सा है।
परिवारवाद के आरोपों का जवाब
झामुमो पर वर्षों से यह आरोप लगता रहा है कि पार्टी का नेतृत्व और बड़े पद मुख्य रूप से सोरेन परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई इस सीट को लेकर भी यही धारणा थी कि परिवार का कोई सदस्य यहां पहुंचेगा। बैद्यनाथ राम के नाम की घोषणा ने इन अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया।
खुद बैद्यनाथ राम सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस फैसले के जरिए उस धारणा को तोड़ने का प्रयास किया है कि झामुमो केवल एक परिवार की पार्टी है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह संदेश सिर्फ विपक्ष के लिए नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी है कि संगठन में लंबे समय तक काम करने वालों के लिए भी शीर्ष तक पहुंचने का रास्ता खुला हुआ है।
अनुसूचित जनजाति वोट बैंक को साधने की कोशिश
इस फैसले में एक बड़ा संकेत यह भी है कि बैद्यनाथ राम अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं। झारखंड की राजनीति में आदिवासी समाज की भूमिका निर्णायक मानी जाती है और झामुमो की पहचान भी आदिवासी आंदोलन से जुड़ी रही है।
जानकार बताते हैं कि बीते वर्षों में भाजपा और अन्य दलों ने भी आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। ऐसे माहौल में राज्यसभा के लिए एक आदिवासी चेहरे को आगे कर झामुमो ने अपने परंपरागत सामाजिक आधार को मजबूत करने का संदेश दिया है। इसे आदिवासी समाज के बीच यह भरोसा कायम करने की कोशिश भी माना जा रहा है कि पार्टी आज भी उनके प्रतिनिधित्व को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।
पलामू प्रमंडल पर खास फोकस
बैद्यनाथ राम का नाता लातेहार जिले से है, जो पलामू प्रमंडल का हिस्सा है। झामुमो की ताकत परंपरागत रूप से संथाल परगना, कोल्हान और कुछ अन्य आदिवासी इलाकों में अधिक रही है, जबकि पलामू प्रमंडल को पार्टी का अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्र माना जाता रहा है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजने का निर्णय इसी क्षेत्र में संगठनात्मक विस्तार की रणनीति का हिस्सा है। इससे पलामू, गढ़वा और लातेहार जैसे इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और झामुमो को नया सामाजिक आधार तैयार करने में मदद मिल सकती है।
संगठन को भी बड़ा संदेश
बैद्यनाथ राम तीन बार विधायक और तीन बार मंत्री रह चुके हैं। लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठन में सक्रिय भूमिका के बावजूद वे राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी जिम्मेदारी से दूर रहे। ऐसे में उनकी उम्मीदवारी यह संकेत भी देती है कि झामुमो अब केवल नए चेहरों या पारिवारिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि संगठन में वर्षों तक काम करने वाले नेताओं को भी अवसर देने की नीति पर बढ़ रही है। यह संदेश आने वाले समय में पार्टी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी अहम साबित हो सकता है।
क्या 2029 की तैयारी है यह दांव?
राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले को केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं मानते। उनके अनुसार हेमंत सोरेन ने 2029 और उससे आगे की राजनीति को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया है। एक ओर परिवारवाद के आरोपों को कमजोर करने की कोशिश हुई है, तो दूसरी ओर आदिवासी वोट बैंक को मजबूत संदेश दिया गया है। साथ ही पलामू प्रमंडल जैसे क्षेत्रों में संगठन विस्तार का आधार भी तैयार किया गया है।
यही वजह है कि बैद्यनाथ राम की उम्मीदवारी को झारखंड की राजनीति में महज एक टिकट वितरण नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक दांव के रूप में देखा जा रहा है जिसमें एक साथ कई लक्ष्य साधने की कोशिश दिखती है।
असली परीक्षा अभी बाकी
हालांकि इस फैसले के राजनीतिक लाभ का वास्तविक आकलन आने वाले चुनावों में ही हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि शिबू सोरेन की खाली हुई सीट पर परिवार से बाहर जाकर बैद्यनाथ राम को चुनकर हेमंत सोरेन ने ऐसा संदेश दिया है जिसकी चर्चा सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हो रही है। अब देखना यह होगा कि यह रणनीति झामुमो के संगठन और वोट बैंक को कितना मजबूती देती है और क्या यह निर्णय पार्टी की राजनीतिक पहुंच को नए क्षेत्रों तक पहुंचाने में कामयाब होता है।
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