प्रशांत किशोर की बिहार में दमदार एंट्री और पेपर लीक के जाल में फंसी सियासत भारत 2 घंटे पहले 2
बिहार में प्रशांत किशोर की जीत ने बीजेपी को उसके गढ़ में हिला दिया है, जबकि झारखंड और कर्नाटक में पेपर लीक के मामलों ने छात्रों का गुस्सा बढ़ा दिया है।

बांकीपुर में प्रशांत किशोर का बड़ा राजनीतिक धमाका

बिहार की राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण उलटफेर देखने को मिला है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी को उसी के अभेद्य माने जाने वाले गढ़ बांकीपुर में करारी शिकस्त दी है। प्रशांत किशोर ने इस सीट पर 19,324 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर की पार्टी अपना खाता खोलने में भी विफल रही थी। हालांकि, नितिन नवीन के इस्तीफे से रिक्त हुई इस सीट पर प्रशांत किशोर ने अपनी धाक जमा दी है। इस मुकाबले में राष्ट्रीय जनता दल यानी RJD भले ही तीसरे स्थान पर रही हो, लेकिन उसके खेमे में इस बात को लेकर खुशी है कि बीजेपी के अहंकार को तगड़ा झटका लगा है।

बांकीपुर की यह जीत केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है, बल्कि यह बीजेपी की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट पर सेंधमारी है। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की थी, जो यहां से लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी बिहार में प्रशांत किशोर को गंभीरता से नहीं ले रही थी, जिसका कारण पिछले साल का विधानसभा चुनाव था। उस चुनाव में प्रशांत किशोर ने 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और सभी हार गए थे। बांकीपुर में भी उन्हें 5 प्रतिशत से कम वोट मिले थे। लेकिन इस बार बांकीपुर में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और 40 स्टार प्रचारकों को मैदान में उतारा था।

दूसरी तरफ, प्रशांत किशोर ने पूरी रणनीति बदली। उन्होंने 250 पेशेवरों की मदद ली और घर घर जाकर प्रचार किया। प्रशांत किशोर ने बीजेपी की हर कमजोरी को वैज्ञानिक तरीके से भुनाया। सम्राट चौधरी की छवि, पार्टी नेताओं का अहंकार और नाराज कार्यकर्ताओं का गुस्सा, प्रशांत किशोर के लिए मददगार साबित हुए। उन्होंने पारंपरिक जातिगत और दलीय समीकरणों को दरकिनार कर एक नई लकीर खींची है, जो भविष्य में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती है।

दतिया में बीजेपी की आंतरिक कलह और हार का कारण

मध्य प्रदेश में भी बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। हालांकि पार्टी ने गुजरात की मांजलपुर सीट पर शानदार जीत दर्ज की, लेकिन दतिया उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6016 वोटों के अंतर से पराजित किया। गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के ही राजेंद्र भारती ने तत्कालीन मंत्री नरोत्तम मिश्रा को साढ़े सात हजार से ज्यादा मतों से हराया था। हालांकि, बाद में एक पुराने मामले में सजा होने के कारण राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त हो गई थी।

दतिया की हार बीजेपी के लिए एक सबक की तरह है। जिस वार्ड में नरोत्तम मिश्रा का आवास है, वहां भी कांग्रेस को बीजेपी से 27 वोट अधिक मिले। स्थानीय जानकारों के अनुसार, नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटा जाना बीजेपी को महंगा पड़ा। उनके समर्थक टिकट न मिलने से बेहद नाराज थे और उन्होंने विरोध प्रदर्शन भी किया था। नरोत्तम मिश्रा के भावुक होने और आंसू बहाने की तस्वीरें भी सामने आई थीं। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नरोत्तम मिश्रा के उन आंसुओं ने ही बीजेपी को अंदरूनी तौर पर हरा दिया। अब हालात यह हैं कि नरोत्तम मिश्रा शोर मचाएंगे और राज्य के बीजेपी नेता हार पर आंसू बहाएंगे।

झारखंड और कर्नाटक में पेपर लीक पर गरमाया माहौल

देश के दो राज्यों, झारखंड और कर्नाटक में पेपर लीक का मुद्दा युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ के रूप में उभरा है। झारखंड लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा में पेपर लीक होने और ओएमआर शीट में हेरफेर के गंभीर आरोप लगे हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि कम अंक लाने वाले उम्मीदवारों का चयन किया गया, जिनमें उत्तर प्रदेश और हरियाणा के 400 अभ्यर्थी शामिल हैं। इन गड़बड़ियों के विरोध में छात्र 29 जुलाई से धरने पर बैठे हैं और उनकी मांग है कि पूरी परीक्षा रद्द की जाए। छात्रों की यह भी मांग है कि झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी वीडियो कॉल के जरिए छात्रों की मांगों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि खराब स्वास्थ्य के कारण वे अभी रांची नहीं पहुंच पा रहे हैं, लेकिन जल्द ही वहां जाकर छात्रों के साथ खड़े होंगे। दिल्ली और रांची के विरोध प्रदर्शनों में फर्क यह है कि दिल्ली में केंद्र सरकार ने पेपर लीक को स्वीकार किया और सीबीआई ने आरोपियों को गिरफ्तार भी किया, जबकि झारखंड में राज्य सरकार सीबीआई जांच के लिए तैयार नहीं है। हैरानी की बात यह है कि जो दल दिल्ली में प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे थे, वे झारखंड में मौन हैं।

पेपर लीक का यही संकट कर्नाटक में भी दिखाई दे रहा है। कर्नाटक लोक सेवा आयोग द्वारा वेटरिनरी ऑफिसर के 400 पदों के लिए निकाली गई भर्ती लिस्ट पर सवाल उठ रहे हैं। उम्मीदवारों का दावा है कि 80 लाख से 1 करोड़ रुपये तक की रिश्वत लेकर भर्तियां की गईं और ओएमआर शीट बदली गई। मामला अब हाई कोर्ट में है और कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर धोखाधड़ी करार दिया है। सरकार ने भर्ती प्रक्रिया रोककर एसआईटी का गठन किया है, जिसे 6 अगस्त तक रिपोर्ट देनी है। इस मामले में बिचौलियों सिकंदर चौधरी और आरिफ मोहम्मद मुल्ला को गिरफ्तार किया गया है। विवाद तब और बढ़ गया जब गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी की, जिससे उनकी गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति का होना युवाओं के भविष्य के साथ बड़ा खिलवाड़ है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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