पितृपक्ष 2026: मणिपुर के लोगों के लिए गोवर्धन क्यों है मोक्ष का धाम, पीपल के नीचे अस्थि गाड़ने की क्या है परंपरा धर्म एक घंटा पहले 1
मणिपुर के वैष्णव समुदाय का ब्रजभूमि से सदियों पुराना नाता है, जहां वे अपने पूर्वजों की शांति के लिए गोवर्धन में विशेष तर्पण और अस्थि विसर्जन करते हैं। जानिए इस अनूठी परंपरा और पितृपक्ष की महत्वपूर्ण तिथियों के बारे में विस्तार से।

ब्रज और मणिपुर का अटूट आध्यात्मिक बंधन

उत्तर भारत की पवित्र भूमि ब्रज और पूर्वोत्तर भारत का राज्य मणिपुर के बीच धार्मिक व सांस्कृतिक संबंध काफी प्राचीन हैं। मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए गोवर्धन स्थित राधा कुंड और शिव कुंड केवल तीर्थ स्थल नहीं हैं, बल्कि ये उनके पूर्वजों के मोक्ष का अंतिम पड़ाव माने जाते हैं। मणिपुर के समाज में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि यदि जीवन के अंतिम समय में या मृत्यु के बाद अस्थियों का विसर्जन ब्रज की पावन भूमि में किया जाए, तो दिवंगत आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष के दौरान यह परंपरा और भी अधिक जीवंत हो उठती है, जब बड़ी संख्या में मणिपुरी श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पितरों का तर्पण करते हैं।

पितृपक्ष 2026 का विशेष समय

इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर दिन शनिवार को पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध के साथ हो रही है। पितृपक्ष की नियमित तिथियों का आरंभ 27 सितंबर दिन रविवार को कृष्ण पक्ष प्रतिपदा तिथि से होगा और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ किया जाएगा। इन दिनों में अपने पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए मणिपुरी समुदाय के लोग पूरे विधि-विधान से अनुष्ठान करते हैं।

राधा कुंड का आध्यात्मिक महत्व

मणिपुर के वैष्णव समाज में पितृपक्ष अथवा सामान्य दिनों में अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। मणिपुरी भाषा में तर्पण की प्रक्रिया को तर्पों कहा जाता है। मणिपुर के लोग बिहार के गयाजी की तरह ही गोवर्धन स्थित राधा कुंड को पितृ शांति का सबसे पवित्र केंद्र मानते हैं। श्रद्धालुओं का यह दृढ़ विश्वास है कि राधा कुंड के जल में भक्ति भाव से तर्पण करने पर पितरों को सीधे भगवान श्री राधा-कृष्ण के चरण कमलों में स्थान मिलता है, जिससे वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अस्थि विसर्जन और भगवान शिव की कृपा

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित शिव कुंड का भी मणिपुर के लोगों के जीवन में विशेष स्थान है। शास्त्रों में भगवान शिव को वैष्णवानां यथा शंभु यानी वैष्णवों का परम गुरु माना गया है। इसी मान्यता के चलते मणिपुर के श्रद्धालु अपने किसी परिजन के देहांत के बाद उनकी अस्थियों का एक हिस्सा गंगा नदी में और शेष भाग ब्रज के शिव कुंड या मानसी गंगा के तट पर विसर्जित करते हैं। उनकी आस्था है कि भगवान शिव की कृपा से ही आत्मा को संसार के बंधन से मुक्ति मिलती है और उन्हें सद्गति प्राप्त होती है।

राजा भाग्यचंद्र और ऐतिहासिक जुड़ाव

ब्रज और मणिपुर के इस गहरे रिश्ते की नींव 18वीं शताब्दी में रखी गई थी। मणिपुर के महाराज भाग्यचंद्र, जिन्हें जय सिंह के नाम से भी जाना जाता है, ने गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय को स्वीकार किया था। इसके बाद से ही मणिपुर का ब्रज धाम से आध्यात्मिक लगाव और प्रगाढ़ हो गया। आज भी राधा कुंड में स्थित गोपाल मणिपुरी मंदिर और वहां मौजूद प्राचीन समाधि स्थल इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के जीवंत प्रमाण हैं। आज भी मणिपुर से श्रद्धालु अपने जीवन के अंतिम समय में ब्रज में निवास करने और पूर्वजों के मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं।

परंपरा का निर्वहन: पीपल के नीचे अस्थि विसर्जन

स्थानीय निवासी दीपू जोशी के अनुसार, मणिपुर से आने वाले श्रद्धालु अपने परिजनों की अस्थियां लेकर गोवर्धन पहुंचते हैं। वे विधि-विधान से राधा रानी को पूजन अर्पण करने के बाद, पीपल के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर अपने पूर्वजों की अस्थियां वहां गाड़ देते हैं। इसके साथ ही, उस पीपल के वृक्ष पर वे कपड़ा बांधते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ प्रार्थना करते हैं। यह दृश्य वहां आने वाले लोगों के लिए बेहद भावुक और आस्था से भरा होता है। लोग यहां ढोल-नगाड़ों के साथ आते हैं और पूरी पारंपरिक मर्यादा के साथ ये क्रियाएं करते हैं। वहां स्थित श्राद्ध कुंड पर एक गया घाट भी बना हुआ है, जहां ये श्रद्धालु तर्पण व श्राद्ध का कार्य संपन्न करते हैं।

पितृपक्ष 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां

  • 26 सितंबर, शनिवार: पूर्णिमा श्राद्ध
  • 27 सितंबर, रविवार: प्रतिपदा श्राद्ध
  • 28 सितंबर, सोमवार: द्वितीया श्राद्ध
  • 29 सितंबर, मंगलवार: तृतीया श्राद्ध, महाभरणी
  • 30 सितंबर, बुधवार: चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
  • 1 अक्टूबर, गुरुवार: षष्ठी श्राद्ध
  • 2 अक्टूबर, शुक्रवार: सप्तमी श्राद्ध
  • 3 अक्टूबर, शनिवार: अष्टमी श्राद्ध
  • 4 अक्टूबर, रविवार: नवमी श्राद्ध
  • 5 अक्टूबर, सोमवार: दशमी श्राद्ध
  • 6 अक्टूबर, मंगलवार: एकादशी श्राद्ध
  • 7 अक्टूबर, बुधवार: द्वादशी और मघा श्राद्ध
  • 8 अक्टूबर, गुरुवार: त्रयोदशी श्राद्ध
  • 9 अक्टूबर, शुक्रवार: चतुर्दशी श्राद्ध
  • 10 अक्टूबर, शनिवार: सर्वपितृ अमावस्या
देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप