मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले इन कड़वे सच को जरूर जान लें भारत एक घंटा पहले 3
मोहम्मद अली जिन्ना की धर्मनिरपेक्ष छवि को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच, उनके इतिहास और पाकिस्तान प्रस्ताव की सच्चाई को समझना बेहद जरूरी है।

जिन्ना की विचारधारा और ऐतिहासिक विरोधाभास

मोहम्मद अली जिन्ना को अक्सर धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में पेश करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों के साथ एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है। धर्म के आधार पर देश के दो टुकड़े करवाने वाले व्यक्ति के लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करना जमीनी हकीकत से दूर नजर आता है। जो लोग केवल 11 अगस्त के उनके भाषण का जिक्र करते हैं, वे जानबूझकर 23-24 मार्च 1940 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम को नजरअंदाज करते हैं, जिसने भारत के विभाजन की नींव रखी थी।

लाहौर का वह ऐतिहासिक प्रस्ताव

23 मार्च 1940 को लाहौर के मिंटो पार्क (जिसे अब इकबाल पार्क के नाम से जाना जाता है) में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया था। यह स्थान बादशाही मस्जिद के ठीक सामने स्थित है। इसी प्रस्ताव को बाद में इतिहास में पाकिस्तान प्रस्ताव के रूप में जाना गया। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि जिन्ना की राजनीति का केंद्र बिंदु धर्म और विभाजन की मांग ही था।

जिन्ना का दो घंटे लंबा भाषण

पाकिस्तान प्रस्ताव के पारित होने से ठीक पहले, मोहम्मद अली जिन्ना ने एक आक्रामक और लंबा भाषण दिया था। करीब दो घंटे चले इस भाषण में उन्होंने अपनी उस नीति को स्पष्ट किया था जिसके आधार पर देश के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को एक अलग स्वायत्त इकाई के रूप में संगठित करने की मांग उठाई गई थी। जो लोग जिन्ना को धर्मनिरपेक्षता का चश्मा पहनाकर देखते हैं, वे अक्सर उनके इस भाषण की उग्रता और उसमें निहित विभाजनकारी सोच पर चुप्पी साध लेते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप