स्वास्थ्य
एक घंटा पहले
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घर में जब कोई छोटा बच्चा जन्म लेता है, तो माता-पिता की खुशियों का ठिकाना नहीं रहता। इसके साथ ही शुरू होता है शिशु की देखभाल का एक नया और बेहद संवेदनशील सफर। नए माता-पिता अक्सर बच्चे के खानपान को लेकर बहुत ज्यादा फिक्रमन्द रहते हैं। वे हर छोटी-बड़ी बात की जानकारी रखना चाहते हैं कि उनके लाडले के लिए क्या सही है और क्या गलत। वैसे तो जन्म से लेकर शुरुआती छह महीनों तक शिशु के लिए मां का दूध ही सबसे उत्तम और संपूर्ण आहार माना जाता है। मां का दूध न केवल भरपूर पोषण देता है बल्कि बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत बनाता है ताकि वह बीमारियों से लड़ सके। लेकिन अक्सर परिजनों के मन में एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या बच्चे को प्यास लगने पर अलग से पानी देना चाहिए? इसी अहम सवाल का जवाब मशहूर बाल रोग विशेषज्ञ यानी पीडियाट्रिशियन डॉ. रवि मलिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करके दिया है और इसके वैज्ञानिक कारण भी समझाए हैं।
छह महीने से पहले पानी की एक बूंद भी है नुकसानदेह
डॉ. रवि मलिक ने पेरेंट्स को सख्त सलाह दी है कि जन्म से लेकर छह महीने की उम्र तक बच्चे को पानी की एक बूंद भी नहीं पिलानी चाहिए। इस उम्र तक शिशु को सिर्फ और सिर्फ मां का स्तनपान ही कराना चाहिए। मां के दूध के अलावा बच्चे को किसी भी तरह का दूसरा तरल पदार्थ या पानी देना उसकी सेहत के साथ खिलवाड़ हो सकता है। कुछ माता-पिता यह सोचते हैं कि यदि बच्चा फॉर्मूला मिल्क पी रहा है तो उसे प्यास बुझाने के लिए पानी की जरूरत होगी, लेकिन डॉक्टर के अनुसार फॉर्मूला दूध तैयार करते समय उसमें पहले से ही तय मात्रा में पानी मिलाया जाता है। इसलिए ऐसे बच्चों को भी ऊपर से अलग से पानी देने की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं होती है।
शिशु को छह महीने से पहले पानी क्यों नहीं देना चाहिए?
डॉक्टर ने इसके पीछे कई महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक कारण बताए हैं, जिन्हें हर माता-पिता को ध्यान में रखना चाहिए:
- दूध में पानी की पर्याप्त मात्रा: मां के दूध में प्राकृतिक रूप से लगभग 80 से 90 प्रतिशत तक पानी मौजूद होता है। यह मात्रा शिशु के शरीर में पानी की कमी को पूरा करने और उसे पूरी तरह से हाइड्रेटेड रखने के लिए बिल्कुल पर्याप्त होती है। इसलिए उसे अलग से पानी पिलाने का कोई औचित्य नहीं है।
- संक्रमण और बीमारियों का खतरा: नवजात शिशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत ही कमजोर होती है। ऐसे में यदि उन्हें बाहर का पानी दिया जाए, तो उसमें मौजूद सूक्ष्म बैक्टीरिया और कीटाणु बच्चे के पेट में पहुंच सकते हैं। इससे बच्चे को दस्त यानी डायरिया, पीलिया या पेट के अन्य गंभीर संक्रमण होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
- वॉटर इन्टॉक्सिकेशन का जानलेवा खतरा: यह एक बेहद गंभीर स्थिति है। छह महीने से कम उम्र के बच्चों के गुर्दे यानी किडनी पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं। जब ऐसे बच्चों को अतिरिक्त पानी पिलाया जाता है, तो उनके शरीर में सोडियम का स्तर बहुत तेजी से कम हो जाता है। सोडियम का स्तर गिरने से बच्चे को दौरे पड़ने की आशंका बढ़ जाती है, जो कि बच्चे के जीवन के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है।
डॉक्टर की इन बातों से साफ है कि नवजात शिशु की नाजुक सेहत के लिए मां का दूध ही अमृत के समान है। छह महीने पूरे होने के बाद ही बच्चे को डॉक्टर की सलाह के अनुसार धीरे-धीरे पानी और अन्य ठोस आहार देना शुरू करना चाहिए। इससे पहले किसी भी स्थिति में बच्चे को पानी देने की भूल बिल्कुल न करें।
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