बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
सिनेमा का वो दौर जब बिजली पर टिकी थी मनोरंजन की दुनिया
आज के दौर में जब हम मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाते हैं, तो किसी भी तकनीकी खराबी या बिजली गुल होने जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। आधुनिक प्रोजेक्टर और शक्तिशाली बैकअप सिस्टम ने मनोरंजन को निर्बाध बना दिया है। हालांकि, सिनेमा का एक दौर ऐसा भी था जब पूरी फिल्म का दारोमदार केवल बिजली पर निर्भर था। उस समय जैसे ही बिजली गुल होती, सिनेमा हॉल का पर्दा पूरी तरह काला पड़ जाता और चलता हुआ शो अचानक रुक जाता था।
उस दौर में न तो आज जैसी इनवर्टर की सुविधाएं मौजूद थीं और न ही कोई बैकअप सिस्टम काम करता था। स्क्रीन पर सन्नाटा होते ही दर्शक अपनी सीटों से उठकर शोर मचाने लगते, सीटियां बजाते और हंगामा करते थे। फिर जैसे ही बिजली वापस आती, प्रोजेक्टर को पुन: चालू किया जाता और फिल्म को वहीं से शुरू किया जाता, जहां वह रुकी थी। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद करीब से समझने के लिए हमने वीणा सिनेमा के अनुभवी प्रोजेक्टर ऑपरेटर सुनील कुमार सिंह से बात की, जो पिछले 45 सालों से इस पेशे में सक्रिय हैं।
मैकेनिकल युग और रील का संघर्ष
सुनील कुमार सिंह के अनुसार, पहले के समय में फिल्में डिजिटल नहीं बल्कि पूरी तरह मैकेनिकल तरीके से दिखाई जाती थीं। उन्होंने बताया कि उस वक्त फिल्में आज की तरह फाइलों में नहीं बल्कि बड़े-बड़े मेटल के चक्कों में लपेटी गई रील के रूप में आती थीं। एक रील में लगभग 15 से 20 मिनट की ही फिल्म समाहित होती थी। प्रोजेक्टर ऑपरेटर के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती थी कि जैसे ही एक रील समाप्त होने वाली हो, दूसरी रील तुरंत तैयार की जाए और उसे मशीन में सेट कर दिया जाए। अगर रील बदलने में थोड़ी सी भी देरी हुई, तो पर्दे पर फिल्म का चलना रुक जाता था।
कार्बन आर्क लैंप का उपयोग
पुराने सिनेमा प्रोजेक्टरों की कार्यप्रणाली के बारे में बताते हुए सुनील ने कहा कि उस समय रोशनी के लिए कार्बन आर्क लैंप का इस्तेमाल होता था। दो कार्बन रॉड्स के बीच उत्पन्न होने वाली तीव्र रोशनी जब रील से होकर गुजरती थी, तभी तस्वीरें पर्दे पर जीवंत हो पाती थीं। ये कार्बन रॉड लगातार घिसती रहती थीं, जिसके कारण उन्हें समय-समय पर बदलना और उनकी सटीक दूरी बनाए रखना ऑपरेटर का सबसे महत्वपूर्ण काम था। छोटी सी लापरवाही भी दर्शकों के अनुभव को खराब कर सकती थी।
ऊंचाई पर बना प्रोजेक्शन रूम
प्रोजेक्शन रूम हमेशा सिनेमाघर के सबसे ऊपरी और सुरक्षित हिस्से में बनाया जाता था। वहां से छोटे झरोखों के माध्यम से प्रोजेक्टर की रोशनी पर्दे पर डाली जाती थी। सुनील बताते हैं कि उस समय का माहौल पूरी तरह अलग था। प्रोजेक्शन रूम में अलग-अलग लैंप और जटिल मशीनें रखी होती थीं, जिनकी मदद से पूरी फिल्म प्रदर्शित की जाती थी। आज के दौर में प्रोजेक्शन रूम पूरी तरह बदल चुका है और वहां कंप्यूटर के साथ-साथ एसी जैसी आधुनिक सुविधाएं भी मौजूद हैं।
आज का डिजिटल और आधुनिक सिनेमा
आज के दौर में वीणा सिनेमा जैसे हॉल में उफौ लेजर प्रोजेक्टर का इस्तेमाल किया जा रहा है। सुनील का कहना है कि अब काम करना पहले की तुलना में बहुत सरल हो गया है। आज केवल कंप्यूटर पर एक क्लिक करने से फिल्म पर्दे पर शुरू हो जाती है। मशीन को ठंडा रखने के लिए विशेष एसी व्यवस्था की गई है, ताकि लंबी फिल्मों के दौरान कंप्यूटर या प्रोजेक्टर गर्म होकर हैंग न हों। आज प्रोजेक्शन रूम में इनवर्टर, कंप्यूटर और डॉल्बी साउंड सिस्टम की कई मशीनें एक साथ रखी रहती हैं।
45 साल का लंबा सफर
अपनी कार्ययात्रा के बारे में बताते हुए सुनील कुमार सिंह कहते हैं कि उन्होंने प्रोजेक्टर ऑपरेटर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत साल 1982 में आनंद टॉकीज से की थी। उसके बाद 1983 में वे चाणक्य सिनेमा में चले गए और वहां काम सीखा। इसके बाद उन्होंने उमा सिनेमा में भी अपनी सेवाएं दीं। वे बताते हैं कि 2013 से वे लगातार वीणा सिनेमा से जुड़े हुए हैं। उन दिनों में एक ऑपरेटर की जरा सी चूक दर्शकों को तुरंत नजर आ जाती थी, जिससे उन्हें हमेशा सतर्क रहना पड़ता था। आज भले ही तकनीक कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, लेकिन उन पुराने दिनों का संघर्ष और मेहनत उन्हें आज भी याद है।
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