बिहार
एक घंटा पहले
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पटना की शान: एक ऐतिहासिक और अभेद्य कोठी
बिहार की राजधानी पटना के ओल्ड कदमकुआं स्थित पार्क रोड पर कई ऐसी इमारतें मौजूद हैं जो अंग्रेजों के शासनकाल की याद दिलाती हैं। इन्हीं आलीशान और ऐतिहासिक कोठियों में से एक है नंदी परिवार का पैतृक मकान। दूर से देखने पर यह घर किसी प्राचीन किले की तरह प्रतीत होता है। इस भवन का निर्माण कार्य लगभग 1930 से 1932 के बीच पूरा किया गया था, जिसका अर्थ है कि यह इमारत आज लगभग 95 साल पुरानी हो चुकी है। इस मकान ने न केवल समय के थपेड़े सहे हैं, बल्कि प्रकृति के भीषण प्रकोप को भी बहुत करीब से देखा है।
विनाशकारी आपदाओं का गवाह रहा यह मकान
इस इमारत की सबसे बड़ी खूबी इसकी अटूट मजबूती है। नंदी परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस मकान ने साल 1934 के उस विनाशकारी बिहार-नेपाल भूकंप को झेला है, जिसने उस दौर में पूरे क्षेत्र में तबाही मचा दी थी। इसके अलावा, साल 1975 में आई भीषण बाढ़ की विभीषिका के दौरान भी यह घर सुरक्षित रहा। उस समय बाढ़ का पानी घर के बाहर करीब ढाई से तीन फीट तक भर गया था और घर के अंदर भी पानी का स्तर एक से डेढ़ फीट तक पहुँच गया था। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, यह इमारत आज भी अपनी पुरानी मजबूती के साथ खड़ी है और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है। फिलहाल नंदी परिवार की तीसरी पीढ़ी, जिसमें कल्याण नंदी और रंजय नंदी शामिल हैं, इस विरासत को सहेज रही है।
बिना प्लास्टर की अनोखी निर्माण कला
रंजय नंदी ने इस मकान की वास्तुकला के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उनके अनुसार, यह घर पूरी तरह से ब्रिटिश पैटर्न पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी ईंटें हैं, जिन्हें टिपकारी तकनीक से सजाया गया है। यह वही विशेष शैली है जिसका उपयोग उस दौर में रेलवे स्टेशनों और सरकारी भवनों के निर्माण में किया जाता था। इस पूरे मकान में कहीं भी सीमेंट का प्लास्टर नहीं किया गया है, जिसकी वजह से इसकी असली लाल ईंटें आज भी बिल्कुल साफ दिखाई देती हैं। यह दो मंजिला घर छह कमरों का है, जहाँ हर कमरे में तीन दरवाजे और एक बड़ी खिड़की का प्रावधान है, जो घर के भीतर हवा और रोशनी का उत्तम संतुलन बनाए रखते हैं।
वास्तुकला और हवादार कमरों की खासियत
रंजय नंदी बताते हैं कि जब यह मकान बना था, तब इसके चारों ओर काफी हरियाली थी और बड़े-बड़े पेड़ थे, जिससे यह और भी अधिक हवादार रहता था। हालांकि अब आसपास कई मकान बन चुके हैं, फिर भी घर के भीतर प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा की कमी नहीं होती। इस मकान की ईंटें आज की ईंटों से आकार में बड़ी हैं; उस दौर की एक ईंट आज की लगभग डेढ़ ईंट के बराबर होती है। यह घर कुल साढ़े तीन से पौने चार कट्ठा जमीन पर फैला हुआ है, जिसके सामने अभी भी पर्याप्त खुला स्थान मौजूद है।
किले जैसा स्वरूप और सजावटी बनावट
इस कोठी की वास्तुकला में औपनिवेशिक शैली की झलक स्पष्ट रूप से दिखती है। लाल ईंटों से बनी यह इमारत बाहर से किसी छोटे किले जैसी लगती है। इसके दोनों कोनों पर बने गोलाकार बुर्ज यानी टावर इसे एक अलग और आकर्षक पहचान देते हैं। भवन के मुख्य द्वार और खिड़कियां मेहराबदार हैं। खिड़कियों के चारों ओर उभरी हुई ईंटों की डिजाइन और कॉर्निस की सजावट उस समय के कारीगरों की निपुणता को दर्शाती है। घर के बीचों-बीच खुला आंगन, चारों ओर बने बरामदे, गोलाकार सीढ़ियां और ऊंची छतों वाले कमरे इस बंगले को औपनिवेशिक वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना बनाते हैं। इमारत का दायां और बायां हिस्सा बिल्कुल एक जैसा है, जो उस समय के कई प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासों के घरों की याद दिलाता है।
सिविल इंजीनियर दादाजी का सपना
कल्याण नंदी के मुताबिक, इस घर की नींव उनके दादा स्व. सिद्धेश्वर नंदी ने रखी थी। वे पेशे से एक सिविल इंजीनियर थे और उस दौर में डेहरी-ऑन-सोन इलाके में अपनी सेवाएं दे रहे थे। 1928-29 के आसपास जब अंग्रेज पटना शहर का विस्तार कर रहे थे और स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी भवनों का निर्माण तेजी से हो रहा था, तब शहर के प्रतिष्ठित और शिक्षित लोगों को जमीनें आवंटित की जा रही थीं। इसी कड़ी में 1929 में उनके दादाजी को ओल्ड कदमकुआं के पार्क रोड में जमीन मिली थी।
इतिहास का वह दौर
उस समय पार्क रोड को पटना के सबसे पॉश इलाकों में गिना जाता था, जहाँ शहर के जाने-माने डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसे बुद्धिजीवी लोग रहते थे। नंदी परिवार इसे केवल एक मकान नहीं बल्कि अपने दादाजी की एक अमूल्य विरासत मानता है। दोनों भाई रंजय और कल्याण ने समय-समय पर इसकी केवल मामूली मरम्मत करवाई है ताकि इसका मूल स्वरूप सुरक्षित रहे। 95 साल का समय बीत जाने के बाद भी, घर के ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। दादाजी की यह इंजीनियरिंग का ही कमाल है कि आज भी यह कोठी उतनी ही मजबूती से खड़ी है, जितनी कि 1930 के दशक में रही होगी।
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