क्या पासपोर्ट ही है भारतीय नागरिकता का पक्का सबूत? जानिए कानून और विशेषज्ञों की राय राष्ट्रीय राजनीति एक महीने पहले 56
भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट को केवल यात्रा दस्तावेज बताने के बाद देश में नागरिकता के प्रमाण को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी और व्यावहारिक नजरिए से इसके अलग-अलग मायने हो सकते हैं।

पासपोर्ट और नागरिकता का कानूनी पेंच

भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा दिए गए एक हालिया बयान ने देश में नागरिकता के प्रमाण को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। मंत्रालय का स्पष्ट मानना है कि पासपोर्ट महज एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का औपचारिक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस बयान के बाद अब कानून के जानकारों और आम जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर नागरिकता साबित करने का अंतिम आधार क्या है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता ने इस मुद्दे पर दोहरी राय रखी है। उन्होंने कहा कि तकनीकी रूप से विदेश मंत्रालय का रुख सही है, क्योंकि पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत पासपोर्ट का मुख्य उद्देश्य विदेश यात्रा की सुविधा देना है, न कि नागरिकता को प्रमाणित करना। हालांकि, उन्होंने इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी जोर दिया है।

  • पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, गलत जानकारी देकर पासपोर्ट हासिल करना कानूनी अपराध है।
  • धारा 20 के तहत विशेष स्थितियों में केंद्र सरकार की मंजूरी से गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट दिया जा सकता है।
  • पासपोर्ट पाने की प्रक्रिया में कई स्तरों पर सत्यापन होता है, जो इसे अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता से जोड़ता है।

क्यों है पहचान का संकट?

विराग गुप्ता के अनुसार, भारत में विदेशों की तरह कोई एक 'यूनिवर्सल नागरिकता कार्ड' मौजूद नहीं है। संविधान के भाग-2 में नागरिकता के प्रावधान तो हैं, लेकिन एकल दस्तावेज के अभाव में आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता सूची जैसे दस्तावेजों को ही पहचान का आधार माना जाता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अनुच्छेद 326 के तहत मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को है, इसलिए मतदाता सूची में नाम होना भी नागरिकता का एक बड़ा संकेतक है।

अराजकता की चेतावनी

विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि यदि नागरिकता साबित करने के लिए पूरे देश की जनसंख्या को कतार में खड़ा कर दिया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। गुप्ता के मुताबिक, अगर 95 फीसदी लोगों को केवल नागरिकता साबित करने के काम में उलझा दिया गया, तो इससे देश में प्रशासनिक अराजकता फैल सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को एक एकीकृत प्रणाली विकसित करनी चाहिए और केवल संदिग्ध मामलों की ही जांच की जानी चाहिए, ताकि आम नागरिकों पर अनावश्यक बोझ न पड़े।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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