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2 महीने पहले
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कराची में धमाके से दहला पाकिस्तान
पाकिस्तान के कराची शहर में शनिवार रात हुए एक जोरदार धमाके ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। यह हमला गुलिस्तान-ए-जौहर इलाके में अंजाम दिया गया, जहां सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना की टुकड़ी यानी रेंजर्स को निशाना बनाया गया। इस भयावह विस्फोट में चार रेंजर्स की मौत की पुष्टि हुई है। पाकिस्तान, जो लंबे समय से आतंकवाद को पनाह देने के लिए कुख्यात रहा है, अब खुद उसी आग में झुलस रहा है जो उसने कभी बोई थी। कराची में हुए इस आतंकी हमले ने एक बार फिर पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र की नाकामी को सबके सामने ला दिया है।
हमले की पूरी घटना
सूत्रों के अनुसार, यह हमला उस समय हुआ जब आतंकियों ने विस्फोटकों से लदे एक वाहन को पाकिस्तानी रेंजर्स के काफिले के पास विस्फोट कर उड़ा दिया। धमाके के बाद दोनों ओर से भीषण गोलीबारी की घटना भी सामने आई, जिसमें सुरक्षा बलों ने 6 उग्रवादियों को मार गिराया। इस पूरे हमले की जिम्मेदारी प्रतिबंधित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े जमात-उल-अहरार ने ली है। जानकारी के मुताबिक, इस आत्मघाती हमले को 'खुलाफा-ए-राशिदीन इस्तिशहादी ब्रिगेड' नाम के एक खास दस्ते ने अंजाम दिया था। माना जा रहा है कि यह संगठन अफगानिस्तान सीमा से सटे खैबर पख्तूनख्वा में सक्रिय है। हालांकि, पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से इस दावे की आधिकारिक तौर पर पुष्टि होना अभी बाकी है।
क्या है जमात-उल-अहरार?
जमात-उल-अहरार पाकिस्तान में लंबे समय से सक्रिय एक कट्टरपंथी आतंकी गुट है। इसकी शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी, जब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के कुछ कमांडरों ने अलग होकर अपना नया संगठन खड़ा किया। इसका नेतृत्व ओमर खालिद खुरासानी कर रहे थे। इस संगठन का घोषित उद्देश्य पाकिस्तान में शरिया कानून आधारित कट्टरपंथी विचारधारा को थोपना और सरकारी तंत्र को अस्थिर करना था। यह समूह मुख्य रूप से सुरक्षा बलों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और सरकारी संस्थानों को निशाना बनाने के लिए जाना जाता है।
खूनखराबे का लंबा इतिहास
जमात-उल-अहरार की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में दर्जनों बड़े हमलों को अंजाम दिया है। वर्ष 2016 में लाहौर के गुलशन-ए-इकबाल पार्क में ईस्टर के मौके पर किया गया आत्मघाती हमला इसी संगठन की एक वीभत्स घटना थी। उस हमले में 70 से अधिक मासूम लोगों की जान गई थी, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। इसके अलावा, नवंबर 2014 में वाघा सीमा पर हुआ हमला भी इसी संगठन ने किया था। संगठन ने 26 अगस्त, 2014 को एक डेढ़ घंटे के वीडियो संदेश के माध्यम से अपने गठन का औपचारिक ऐलान किया था।
वैश्विक संबंधों और संगठन का स्वरूप
इस संगठन के अधिकांश सदस्य वही हैं जो पहले तालिबान के साथ जुड़े हुए थे और वर्तमान में अफगानिस्तान की सीमाओं के पास के कबीलाई इलाकों में जमे हुए हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, जमात-उल-अहरार के तार अल-कायदा जैसे अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी समूहों से भी जुड़े रहे हैं। यद्यपि यह गुट टीटीपी से अलग हुआ था, लेकिन बाद के वर्षों में इनके बीच तालमेल काफी गहरा हो गया। अंततः साल 2020 में इस समूह ने दोबारा टीटीपी में अपने विलय की घोषणा कर दी थी, जिससे इसकी स्वतंत्र पहचान कम हो गई है।
आतंक का चक्रव्यूह
पाकिस्तानी फौज और वहां की खुफिया एजेंसियां भले ही इस समूह के खिलाफ कई बड़े सैन्य अभियान चलाने का दावा करती रही हों, जिनमें कई कमांडर मारे भी गए, लेकिन यह संगठन पूरी तरह खत्म नहीं हो सका। सीमावर्ती इलाकों में इनके लड़ाके लगातार हिंसक गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं। जमात-उल-अहरार को पाकिस्तान सहित दुनिया के कई देशों ने आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है। कराची में हुए इस ताजा हमले ने यह साबित कर दिया है कि आतंकवाद की चुनौती पाकिस्तान के लिए न केवल पुरानी है, बल्कि यह समय के साथ और अधिक घातक होती जा रही है।
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