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एक घंटा पहले
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विचारों
क्या पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए आज़ादी का दिन नज़दीक आ गया है? रावलाकोट की सड़कों पर बुधवार आधी रात उमड़ा यह जनसमूह कोई आम विरोध प्रदर्शन नहीं था। यह दशकों के दमन, ज़बरन कब्जे और आर्थिक बदहाली के विरुद्ध फूट पड़ा वह आक्रोश है, जो इस्लामाबाद की सत्ता की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
अंधेरी रात को चीरती मोबाइल फ्लैशलाइट्स की अनगिनत रोशनियां केवल उजाला नहीं फैला रहीं, बल्कि यह ऐलान कर रही हैं कि अब पाकिस्तान के पैरों तले से PoK की ज़मीन खिसक चुकी है। यह उद्घोष है कि बंदूक के बल पर थोपी गई गुलामी का दौर अब खत्म हो रहा है।
पहली बार इतना संगठित विद्रोह
पीओके में पहली बार इतना भारी, संगठित और अडिग विद्रोह देखने को मिल रहा है। इससे पहले कभी इतनी बड़ी तादाद में लोग अपनी जान की परवाह किए बिना सड़कों पर नहीं उतरे थे। यह जनसमुद्र इस बात की गवाही दे रहा है कि अवाम अब डर की सीमा को पार कर चुकी है।
यह भीड़ न थकी है और न रुकी है। पूरी-पूरी रात एक साथ बैठकर, भूखे-प्यासे रहकर भी लोग डटे हुए हैं और वह भी तब, जब पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स उन पर गोलियों की बारिश कर रहे हैं। निर्दोष नागरिकों का खून बहाकर भी पाकिस्तानी हुकूमत इस हौसले को नहीं तोड़ पाई। यह साफ संकेत है कि यह आंदोलन पाकिस्तान के ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा है।
दमन का दौर और जागती हुई जनता
दशकों तक पाकिस्तान ने PoK के नागरिकों का सिर्फ इस्तेमाल किया। वहां के प्राकृतिक संसाधनों, खासकर पानी और हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी का बेरहमी से दोहन हुआ, लेकिन बदले में लोगों को क्या मिला? आसमान छूती महंगाई, आटे के लिए मीलों लंबी कतारें और कमर तोड़ देने वाले बिजली के बिल।
जब अवाम ने अपने हक के लिए आवाज़ उठाई, तो जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के बैनर तले एकजुट हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने सीधी गोलियां चलाईं। रावलाकोट में जो गुस्सा उबल रहा है, वह उसी बर्बरता का नतीजा है।
स्थानीय नेताओं और JAAC के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब पाकिस्तानी सेना की इस गुंडागर्दी को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने न केवल इस दमन की कड़ी निंदा की है, बल्कि गोलीबारी में मारे गए और घायल हुए नागरिकों के लिए न्याय की मांग करते हुए एक स्वतंत्र जांच की भी मांग की है। अब यह लड़ाई सिर्फ सब्सिडी या बिजली के बिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अस्तित्व और आज़ादी की लड़ाई बन चुकी है।
रावलाकोट से फैलती चिंगारी
रावलाकोट से उठी यह चिंगारी मुजफ्फराबाद, मीरपुर और गिलगित-बाल्टिस्तान तक फैल चुकी है। इसे अब पुलिस की लाठियों या सेना की बंदूकों से दबाया नहीं जा सकता। यह महज़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि पाकिस्तान के पतन और PoK की मुक्ति की ऐतिहासिक शुरुआत है। पाकिस्तान के लिए उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और इतिहास गवाह रहेगा कि उसकी अपनी ही करतूतों ने उसके साम्राज्य के अंत की पटकथा लिखी।
इस्लामाबाद का डर और सेना की लाचारी
खुद को देश का भाग्यविधाता समझने वाली पाकिस्तानी सेना आज इस जनसैलाब के सामने लाचार और बौनी नज़र आ रही है। जो सेना हमेशा कश्मीर के नाम पर अपनी अवाम को गुमराह करती रही, आज उसी के अवैध कब्जे वाले इलाके में 'गो बैक पाकिस्तान' और 'पाकिस्तान से आज़ादी' के नारे गूंज रहे हैं।
पाकिस्तानी जनरलों का सबसे बड़ा डर यही है कि अगर PoK उनके हाथ से निकल गया, तो उनकी पूरी राजनीति और वजूद का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। यही वजह है कि इस विद्रोह को कुचलने के लिए क्रूरतम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इंटरनेट बंद करना, रास्तों को ब्लॉक करना और सीधे सीने पर गोलियां चलाना—ये सब पाकिस्तान की हताशा को दर्शाते हैं।
लेकिन इस्लामाबाद यह भूल गया कि जब जनता अपनी पहचान और स्वाभिमान के लिए उठ खड़ी होती है, तो दुनिया की कोई भी सेना उसे रोक नहीं सकती। रावलाकोट का यह आंदोलन इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
दुनिया के सामने उजागर हुई सच्चाई
इस रैली के ज़रिए PoJK के नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों से सीधी गुहार लगाई है। उन्होंने दुनिया से अपील की है कि वह इस क्षेत्र में हो रहे घोर मानवाधिकार उल्लंघनों पर अपनी आंखें मूंदना बंद करे। जो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को कश्मीरियों का पैरोकार बताता फिरता था, वह आज अपने ही नियंत्रण वाले इलाके में नरसंहार पर उतारू है।
यह भारत के लिए भी एक बेहद अहम संदेश है। भारत हमेशा से यह रुख रखता आया है कि PoK समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। आज PoK की जनता खुद पाकिस्तान के क्रूर शासन से मुक्ति चाहती है। यह विद्रोह भारत के उस दावे को और मज़बूत करता है कि PoK के लोग पाकिस्तान के अवैध और औपनिवेशिक शासन से पूरी तरह तंग आ चुके हैं।
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