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3 घंटे पहले
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PoK में फिर से उबल पड़ा है जनआक्रोश
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में एक बार फिर से हालात गंभीर हो गए हैं। वहां की जनता अब पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों और सैन्य शासन से पूरी तरह आजिज आ चुकी है। जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी, जिसे जेकेजेएएसी (JKJAAC) के नाम से जाना जाता है, ने अब अपनी आवाज बुलंद कर दी है। इस संगठन ने ऐलान किया है कि पीओके में पाकिस्तानी सेना की सुरक्षा नाकेबंदी और उनके अनुचित दखल के खिलाफ अब एक बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र से पाकिस्तानी सेना को पीछे हटाना और आम लोगों को बुनियादी सुविधाएं वापस दिलाना है।
रावलाकोट में बना आंदोलन का पूरा खाका
हाल ही में रावलाकोट में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई है, जिसमें छात्र संगठनों, अभिभावकों और वहां की सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस बैठक में आंदोलन के नेता उमर नजीर कश्मीरी ने पाकिस्तानी सरकार और वहां के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए। उमर नजीर कश्मीरी ने साफ कर दिया है कि अब केवल प्रदर्शन से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसे एक व्यापक जन आंदोलन का रूप देना होगा। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की है कि वे अब इस संघर्ष में खुलकर सामने आएं। इस रणनीति के तहत केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आवाज उठाने की योजना बनाई गई है। ब्रिटेन और यूरोप के शहरों में भी एकजुटता मार्च निकालने की तैयारी की जा रही है ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि किस तरह पीओके की जनता घुट-घुट कर जी रही है।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर सेना का ग्रहण
पीओके में प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों का सैन्य नियंत्रण में होना है। जेकेजेएएसी (JKJAAC) का आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने संवेदनशील जिलों में कई स्कूल, कॉलेज और प्रमुख चिकित्सा केंद्रों को अपने कब्जे में ले लिया है। इस नाकेबंदी के कारण न केवल छात्रों की पढ़ाई बाधित हो रही है, बल्कि बीमार और घायल नागरिक भी सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं। संगठन के अनुसार, सुरक्षा बलों द्वारा की गई घेराबंदी ने सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। हजारों छात्र ऐसे हैं जो महीनों से अपनी कक्षाओं में नहीं जा सके हैं, और जो मरीज इमरजेंसी के समय अस्पताल पहुंचना चाहते हैं, उन्हें भी सुरक्षा नाकों पर रोक दिया जाता है या वापस भेज दिया जाता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जनता की आवाज दबाने का एक तरीका है।
प्रदर्शन की व्यापक कार्ययोजना
जेकेजेएएसी (JKJAAC) ने अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए चरणों में प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है। मुख्य विरोध प्रदर्शन पूंछ डिवीजन के धीरकोट में दोपहर 1:30 बजे आयोजित किया जाएगा। इस प्रदर्शन की एक खास बात यह है कि इसमें माताओं, बहनों और छात्राओं को बड़ी संख्या में शामिल होने का आह्वान किया गया है। प्रदर्शनकारियों को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म पहनाकर लाएं और उनके हाथों में स्कूल बैग होने चाहिए। यह प्रतीकात्मक प्रदर्शन इस बात को दर्शाएगा कि सेना ने कैसे बच्चों के भविष्य यानी उनकी शिक्षा को छीन लिया है। धीरकोट के अलावा, मीरपुर और मुजफ्फराबाद में भी बड़े स्तर पर एकजुटता रैलियां निकालने की योजना है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजेगा पीओके का दर्द
आंदोलन को सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित न रखते हुए, संगठन ने इसे वैश्विक मंच पर ले जाने की तैयारी की है। ब्रिटेन के बर्मिंघम और इटली में होने वाले एकजुटता मार्च इसी रणनीति का हिस्सा हैं। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य मानवाधिकार उल्लंघन और प्रशासनिक नाकेबंदी के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखना है। यूरोप में बसे कश्मीरी प्रवासियों को भी इस आंदोलन से जोड़ा जा रहा है ताकि इस संदेश को वैश्विक पटल पर मजबूती से रखा जा सके। जेकेजेएएसी (JKJAAC) का यह स्पष्ट मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं बढ़ेगा, पाकिस्तान की सरकार और वहां की सेना अपनी दमनकारी नीतियों में कोई बदलाव नहीं करेगी।
शांतिपूर्ण संघर्ष और भविष्य की मांगें
पीओके में फिलहाल तनाव अपने चरम पर है। लंबे समय से चल रहे इंटरनेट प्रतिबंधों और आवाजाही पर रोक ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया है। संगठन ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उनका यह विरोध प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं। जेकेजेएएसी (JKJAAC) ने अपनी मांगें रखते हुए कहा है कि उन्हें केवल चार चीजें चाहिए: पहली, पाकिस्तानी सेना को क्षेत्र से पीछे हटना होगा। दूसरी, शैक्षणिक संस्थानों से सैन्य कब्जा हटाना होगा। तीसरी, चिकित्सा केंद्रों को बिना किसी सैन्य बाधा के खोलना होगा। और चौथी, हिरासत में लिए गए उन सभी स्थानीय कार्यकर्ताओं को बिना किसी शर्त के रिहा करना होगा, जिन्हें केवल आवाज उठाने के जुर्म में जेल में डाला गया है। अब देखना यह है कि आसिम मुनीर की सेना इस जन आक्रोश का सामना कैसे करती है।
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